कुछ नई कवितायेँ -7 (1) तेज़ बुखार के बाद गले में बची हल्की खरास की तरह है एक उदास रविवार के बाद आने वाला सो...
कुछ नई कवितायेँ -7 (1) तेज़ बुखार के बाद गले में बची हल्की खरास की तरह है एक उदास रविवार के बाद आने वाला सो...
उम्र गुज़ारी यहीं बरसों जहां लिखा भी,पढ़ा भी लगातार बिना रुके-थके इसी शहर के आँगन में फितूर पालकर कई सारे गड़ा भी और खपा भी नतीजतन ह...
ये समय पत्नी,बच्चों को बगीचे में झुलाने का घर,गाड़ी के सपने सजाने और मात-पिता भुलाने का तुम कितने भोले हो अब भी भगत-सुभाष-गांधी...
(ये पंक्तिया हमारे आकाशवाणी चित्तौड़ के साथी अभियंता अरविंद जी सुखवाल के नहीं रहने पर मन के भाव हैं.) रेडियो का एक आदमी जाता रहा ...
घंटों - घंटों रहा किले में किले बने कविताओं के तथ्यों की ठोकापीटी से छंद रचे कविताओं के दुपह...
खंडित महल नींदे - खोदे इसबारी पहाड़ बोएं बावडियों सहित मंदिर उगे ऐसे शंकर बीज बोएं अटूट मूर्तियाँ फलेफ...
चित्तौड़ का किला देखने के लिहाज़ से आई बाहरी टीम पर मेरी सध्य विचारित कविता -------------------------------------------------- कहाँ मिल...
कितना ज़रूरी है हस्तक्षेप व्यवस्था में इस दौर फटती पेंट के पिछवाड़े लगे ठेगरे की मानिंद सोचना निहायत ज़रूरी है अटरम-शटरम के आलम में छानी ...
है हमारे आसपास देखती और सोचती पारखी नज़र है ख़ास है हमारे आसपास बीहड़ों से शहरों में ये जंगलों से रास्ते गुर्राते और डराते हैं गांवों के भ...
देख नजारा थम गया मैं भी आज की जहां किले में थमी हुई देखी अलग-अलग इमारतें एकसाथ आपस की बातें बेलती कुछ दूर ऐंठी हुई हवेलियाँ थी ...
(1) सूरज की अठखेली और यहीं भोर के उठान से दिन देहरी तक आया चलती रही घंटे,मिनट और सैकंड की सुइयां टिकटिक करती लय में गोधूली सांझ को लां...
जीवन के इस मेले में बन मुसाफिर देखा सब देखे कई भान्त के लोग पगड़ी बिन पगड़ी लुगड़ी बिन लुगड़ी इसी धुपीली सड़क पर देखे आते-जाते सब जीवन क...
कौन नहीं जानता है कि गड्डे,नालियां और स्पीडब्रेकर हैं बहुत बनी और बची हुई है फिर भी सड़क अपने होने के अहसास से बेखबर सतत,गूंगी और चुपचाप का...
तुम अब नया विचार दो कि सच को अब हम सपाट लिखें धुंधला रहे इस वितान को यूं मिलके साफ़-साफ़ लिखें दूर-दूर महल खड़े हैं सारे ढेरों अवशेष पड़े ह...
जाने अनजाने इतवार के इतवार किले में हो जाता मेरा पगफेरा शहर से कुछ ऊँचें पहाड़ पर हाँ वीरान महलों का लगा एक डेरा एकांत खोजते पाँव मेरे जा ल...
जब मैं छोटा-सा था माँ की गोद-सी स्लेट पर नींदें आ आकर रचती थी लोरियों-सी मनभाती कविताएँ जिन्हें जिया माँ-पिताजी ने साथ गिरते-पड़ते फिर उठते...
अतीत में जाते रास्तों वाली एक ही फिल्म जो दिखाती है वर्तमान का उघड़ा हुआ सच आती आँखों के समक्ष बारम्बार मन दहलाती सुबहें शनिवार की जों आत...
फुदकती गिलहरियों को हथियाने की लगातार और बेकार कोशिशें दुस्साहसों को ठेंगा दिखाती सफलताएं अतीत ही हो सकती थी कि भोर होते ही बिस्तर छोड़ बचप...
कभी सरपट सड़क पर फटफट दौड़ती कारों सी धारदार बहती थी नदी मेरे शहर की कभी मारे खुशी के वो बावरी पूल तक जा थप्पी दे आती थी किलकाराते बच्चों की...
बिम्ब:-अतीत के पन्नों से -2 घारे,बांस-बल्लियों से बनते थे मकान अतीत में थे अपनेपन से लथपथ पूरे हाँ भुला नहीं हूँ मैं आज भी अरसे पहले ...