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15 अक्टूबर, 2012
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कुछ नई कवितायेँ -7

सोमवार, अक्टूबर 15, 2012

कुछ नई कवितायेँ -7 (1) तेज़ बुखार के बाद गले में बची हल्की खरास की तरह है एक उदास रविवार के बाद आने वाला सो...

14 जनवरी, 2012
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इसी शहर के आँगन में

शनिवार, जनवरी 14, 2012

उम्र गुज़ारी यहीं बरसों जहां लिखा भी,पढ़ा भी लगातार बिना रुके-थके इसी शहर के आँगन में फितूर पालकर कई सारे गड़ा भी और खपा भी नतीजतन ह...

26 सितंबर, 2011
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ये कैसा समय है ?

सोमवार, सितंबर 26, 2011

ये समय पत्नी,बच्चों को बगीचे में झुलाने का घर,गाड़ी के सपने सजाने और मात-पिता भुलाने का तुम कितने भोले हो अब भी भगत-सुभाष-गांधी...

09 सितंबर, 2011
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हमारे अरविंद जी को समर्पित कुछ पंक्तिया

शुक्रवार, सितंबर 09, 2011

 (ये पंक्तिया हमारे आकाशवाणी चित्तौड़ के साथी अभियंता अरविंद जी सुखवाल के नहीं रहने पर मन के भाव हैं.) रेडियो का एक आदमी जाता रहा ...

08 सितंबर, 2011
किले बने कविताओं के

किले बने कविताओं के

गुरुवार, सितंबर 08, 2011

घंटों - घंटों रहा किले में किले बने कविताओं के तथ्यों की ठोकापीटी से छंद रचे कविताओं के दुपह...

आओ किले उगाएं

आओ किले उगाएं

गुरुवार, सितंबर 08, 2011

खंडित महल नींदे - खोदे इसबारी पहाड़ बोएं बावडियों सहित मंदिर उगे ऐसे शंकर बीज बोएं अटूट मूर्तियाँ फलेफ...

28 अगस्त, 2011
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साफ़ हो गए सारे आँगन

रविवार, अगस्त 28, 2011

चित्तौड़ का किला देखने के लिहाज़ से आई बाहरी टीम पर मेरी सध्य विचारित कविता -------------------------------------------------- कहाँ मिल...

13 अगस्त, 2011
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अन्ना हजारे को समर्पित एक कविता

शनिवार, अगस्त 13, 2011

कितना ज़रूरी है हस्तक्षेप व्यवस्था में इस दौर  फटती पेंट के पिछवाड़े लगे ठेगरे की मानिंद सोचना निहायत ज़रूरी है  अटरम-शटरम के आलम में छानी ...

10 अगस्त, 2011
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हमारे आसपास

बुधवार, अगस्त 10, 2011

है हमारे आसपास देखती और सोचती पारखी नज़र है ख़ास है हमारे आसपास बीहड़ों से शहरों में  ये जंगलों से रास्ते गुर्राते और डराते हैं गांवों के भ...

02 अगस्त, 2011
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कविता में कविता :-ऐंठी हुई हवेलियाँ

देख नजारा थम गया मैं भी आज की जहां किले में थमी हुई देखी अलग-अलग इमारतें  एकसाथ आपस की बातें बेलती कुछ दूर ऐंठी हुई हवेलियाँ थी  ...

02 जून, 2011
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रात

गुरुवार, जून 02, 2011

(1) सूरज की अठखेली और यहीं  भोर के उठान से  दिन देहरी तक आया चलती रही  घंटे,मिनट और सैकंड की सुइयां टिकटिक करती लय में  गोधूली सांझ को लां...

26 मई, 2011
आते-जाते इस जीवन में

आते-जाते इस जीवन में

जीवन के इस मेले में बन मुसाफिर देखा सब देखे कई भान्त के लोग पगड़ी बिन पगड़ी लुगड़ी बिन लुगड़ी  इसी धुपीली सड़क पर  देखे आते-जाते सब जीवन क...

07 मई, 2011
कविता;-'बेचारी सड़क'

कविता;-'बेचारी सड़क'

शनिवार, मई 07, 2011

कौन नहीं जानता है कि गड्डे,नालियां और स्पीडब्रेकर हैं बहुत बनी और बची हुई है फिर भी सड़क अपने होने के अहसास  से बेखबर सतत,गूंगी और चुपचाप का...

15 मार्च, 2011
किले में कविता;-सच को अब सपाट लिखें

किले में कविता;-सच को अब सपाट लिखें

तुम अब नया विचार दो कि सच को अब हम सपाट लिखें धुंधला रहे इस वितान को यूं मिलके साफ़-साफ़ लिखें दूर-दूर महल खड़े हैं सारे ढेरों अवशेष पड़े ह...

05 मार्च, 2011
किले में कविता;-मन की ठाने चार कबूतर

किले में कविता;-मन की ठाने चार कबूतर

जाने अनजाने इतवार के इतवार किले में हो जाता मेरा पगफेरा शहर से कुछ ऊँचें पहाड़ पर  हाँ वीरान महलों का लगा एक डेरा एकांत खोजते पाँव मेरे जा ल...

27 फ़रवरी, 2011
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कविता:-पड़ाव दर पड़ाव-1

जब मैं छोटा-सा था माँ की गोद-सी स्लेट पर  नींदें आ आकर रचती थी लोरियों-सी मनभाती कविताएँ जिन्हें जिया माँ-पिताजी ने साथ गिरते-पड़ते फिर उठते...

22 फ़रवरी, 2011
बिम्ब:-वो शनिमहाराज के बन्दे

बिम्ब:-वो शनिमहाराज के बन्दे

अतीत में जाते रास्तों वाली एक ही फिल्म जो  दिखाती है वर्तमान का उघड़ा हुआ सच  आती आँखों के समक्ष बारम्बार मन दहलाती सुबहें शनिवार की  जों आत...

20 फ़रवरी, 2011
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बिम्ब:-अतीत के पन्नों से -4

फुदकती गिलहरियों को हथियाने की लगातार और बेकार कोशिशें दुस्साहसों को ठेंगा दिखाती सफलताएं अतीत ही हो सकती थी कि भोर होते ही बिस्तर छोड़ बचप...

16 फ़रवरी, 2011
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बिम्ब:-अतीत के पन्नों से -3

कभी सरपट सड़क पर फटफट दौड़ती कारों सी धारदार बहती थी नदी मेरे शहर की कभी मारे खुशी के वो बावरी पूल तक जा थप्पी दे आती थी किलकाराते बच्चों की...

15 फ़रवरी, 2011
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बिम्ब:-अतीत के पन्नों से -2

बिम्ब:-अतीत के पन्नों से -2 घारे,बांस-बल्लियों से बनते थे मकान अतीत में थे अपनेपन से लथपथ पूरे हाँ भुला नहीं हूँ मैं आज भी अरसे पहले ...

 
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