दरारों के दौर में देख रहा हूँ मैं इस दरारों के दौर में भी आज अखंड खड़ी हैं वो इमारतें किले की अकेली लगती है रात के अँधेरे में इशारों से अपन...
दरारों के दौर में देख रहा हूँ मैं इस दरारों के दौर में भी आज अखंड खड़ी हैं वो इमारतें किले की अकेली लगती है रात के अँधेरे में इशारों से अपन...
पूरब का अपना रूतबा था भले कहानी लम्बी थी पर वो कहने को आतुर था और मैं सुनने को बेताब एक सुबह की संगत थी जब वो कहता रहा देर तलक और मैं सुनता...
मावठ में मुलाकात बादल बरसे पूरे मन से तो आज मिला आराम पान थूंकी दिवारें धूल गई संकड़ी गलियाँ चमक उठी कामनाएं पूर गई आज मिला आराम बहता पानी प...
मैं अवेरता हूँ पत्थर खस्ताहाल महल देख तुम चकित न होना पलभर सारी यादें ताजा करते यहीं ठिकाने भामाशाह के आँख फाड़ फाड़ क्या हो देखते जो बिखरा ...
सच को अब सपाट लिखें तुम अब नया विचार दो कि सच को अब हम सपाट लिखें धुंधला रहे इस वितान को यूं मिलके साफ-साफ लिखें दूर-दूर महल खड़े हैं सारे ढ...
मन की ठाने चार कबूतर जाने अनजाने इतवार के इतवार किले में हो जाता मेरा पगफेरा शहर से कुछ ऊँचें पहाड़ पर हाँ वीरान महलों का लगा एक डेरा एकांत ...
कौन खबर ले किले की अतिथि को दिखाने के काम आता था किला हमारे शहर का विचार नकली था मगर बरसों बना रहा अटल पुरखों से हमारे घर में कभी कभार बन जा...
बंटवारा जी करता है आज बाँट लें किले की सारी दौलत कुछ तुम रख लो,कुछ मैं रख लूं ये हम सब की माया आदार तुम दे न पाओ शायद कुछ धन जुटा लो जल्दी क...
कुम्हलाती इमारतें बदलाव उपजते,थाल खाते जमाने में उन चेहराछिपाऊ लड़कियों की मानिंद अब पहचाने नहीं जाते हालात के हवाले छोड़े ये किले गिरते उठत...
न होकम रहे न दाता न होकम रहे न दाता अब रखवाला कौन बदल गया है बहुत कुछ इधर बरसों में आया झांकने आज मौसम तक रुख बदलता आकर यहाँ हवा भी ठहरती ह...
जब ठिठुरा किला पूरी रात न पूछा किसी ने बिछोने का न ओढ़ाने की सोची किसी ने आज जब ठिठुरा किला पूरा शहर में रातभर पिछले दिनों की मावठ का असर है...
एक पुरानी बस्ती एक पुरानी बस्ती भी है मेरे शहर के किले में लोग रहते है,मिलते है खाते है,कमाते हैं घरों में भरे हैं बूढ़े,जवान औए बच्चे चलती ...
इमारतें चला जाता हूँ कभी वक्त निकालकर भूले भटके याद करता हूँ आम आदमी की तरह देर सवेर पुरानी काम की चीजें, किले,संस्कृति या हो सरोकार आज फिर ...
चमकी महल की दिवारें सांप,अजगर,बर्रे और तत्तैया बसते थे जहां घर समझ कर मजदूर घास काटते रहे दिनभर अब मैदान साफ है वहाँ पाईप लम्बे करते रहे पान...
तुम्हे घर का कहूं या मेहमान घोड़े,ऊँट और हाथी नहीं रहे अब तोफें हो गई मौन है झर्झरपन पर रोज बिलखते उन महलों का मालिक कौन है कचोटता है मन आज ...
महल का विराना कुछ देर रतनसिंह महल के झरोखे में बैठ आया सुकून के साथ जी आया कुछ पल भव्य लेकिन झर्झर इमारतें तैरती रही आँखों में देर तलक शाम क...
अब और हम छुपाएं क्या महंगाई के ग्राफ में उलझा ये कमरा नहीं किराए का यूं ही बिखरी पड़ी रहती है पुस्तों की मेहनत खुले में आते ही नहीं कोई जौहर...
मस्टररोल की हाजरी मदन-मोहम्मद,घासी-गीता इसी भांत के कुछ मजदूर विक्रम-बेताल से कन्धों पर बैठ चढ़े-उतारे गीली रस्सी,बांस अनेक लटके घंटों लक्कड...
अब अकुलाते है मुद्दे समाज के किराए के मकान की लम्बी और चौड़ी छत उजाला पसरता है जहां किले की ओट से निकले सूरज के बूते खैरात में बंटे लड्डू सा...