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17 फ़रवरी, 2012
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दरारों के दौर में

शुक्रवार, फ़रवरी 17, 2012

दरारों के दौर में देख रहा हूँ मैं इस दरारों के दौर में भी आज अखंड खड़ी  हैं वो इमारतें किले की अकेली लगती है रात के अँधेरे में इशारों से अपन...

30 दिसंबर, 2011
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पूरब का अपना रूतबा था

शुक्रवार, दिसंबर 30, 2011

पूरब का अपना रूतबा था भले कहानी लम्बी थी पर वो कहने को आतुर था और मैं सुनने को बेताब एक सुबह की संगत थी जब वो कहता रहा देर तलक  और मैं सुनता...

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मावठ में मुलाकात

शुक्रवार, दिसंबर 30, 2011

मावठ में मुलाकात बादल बरसे पूरे मन से तो आज मिला आराम पान थूंकी दिवारें धूल गई संकड़ी गलियाँ चमक उठी कामनाएं पूर गई आज मिला आराम बहता पानी प...

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मैं अवेरता हूँ पत्थर

शुक्रवार, दिसंबर 30, 2011

मैं अवेरता हूँ पत्थर खस्ताहाल महल देख तुम चकित न होना पलभर सारी यादें ताजा करते यहीं ठिकाने भामाशाह के आँख फाड़ फाड़ क्या हो देखते जो बिखरा ...

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सच को अब सपाट लिखें

शुक्रवार, दिसंबर 30, 2011

सच को अब सपाट लिखें तुम अब नया विचार दो कि सच को अब हम सपाट लिखें धुंधला रहे इस वितान को यूं मिलके साफ-साफ लिखें दूर-दूर महल खड़े हैं सारे ढ...

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मन की ठाने चार कबूतर

शुक्रवार, दिसंबर 30, 2011

मन की ठाने चार कबूतर जाने अनजाने इतवार के इतवार किले में हो जाता मेरा पगफेरा शहर से कुछ ऊँचें पहाड़ पर हाँ वीरान महलों का लगा एक डेरा एकांत ...

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कौन खबर ले किले की

शुक्रवार, दिसंबर 30, 2011

कौन खबर ले किले की अतिथि को दिखाने के काम आता था किला हमारे शहर का विचार नकली था मगर बरसों बना रहा अटल पुरखों से हमारे घर में कभी कभार बन जा...

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बंटवारा

शुक्रवार, दिसंबर 30, 2011

बंटवारा जी करता है आज बाँट लें किले की सारी दौलत कुछ तुम रख लो,कुछ मैं रख लूं ये हम सब की माया आदार तुम दे न पाओ शायद कुछ धन जुटा लो जल्दी क...

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कुम्हलाती इमारतें

शुक्रवार, दिसंबर 30, 2011

कुम्हलाती इमारतें बदलाव उपजते,थाल खाते जमाने में उन चेहराछिपाऊ लड़कियों की मानिंद अब पहचाने नहीं जाते हालात के हवाले छोड़े ये किले गिरते उठत...

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न होकम रहे न दाता

शुक्रवार, दिसंबर 30, 2011

न होकम रहे न दाता न होकम रहे न दाता अब रखवाला कौन बदल गया है बहुत कुछ इधर बरसों में आया झांकने आज मौसम तक रुख बदलता आकर यहाँ हवा भी ठहरती ह...

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जब ठिठुरा किला पूरी रात

शुक्रवार, दिसंबर 30, 2011

जब ठिठुरा किला पूरी रात न पूछा किसी ने बिछोने का न ओढ़ाने की सोची किसी ने आज जब ठिठुरा किला पूरा शहर में रातभर पिछले दिनों की मावठ का असर है...

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एक पुरानी बस्ती

शुक्रवार, दिसंबर 30, 2011

एक पुरानी बस्ती एक पुरानी बस्ती भी है मेरे शहर के किले में लोग रहते है,मिलते है खाते है,कमाते हैं घरों में भरे हैं बूढ़े,जवान औए बच्चे चलती ...

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इमारतें

शुक्रवार, दिसंबर 30, 2011

इमारतें चला जाता हूँ कभी वक्त निकालकर भूले भटके याद करता हूँ आम आदमी की तरह देर सवेर पुरानी काम की चीजें, किले,संस्कृति या हो सरोकार आज फिर ...

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चमकी महल की दिवारें

शुक्रवार, दिसंबर 30, 2011

चमकी महल की दिवारें सांप,अजगर,बर्रे और तत्तैया बसते थे जहां घर समझ कर मजदूर घास काटते रहे दिनभर अब मैदान साफ है वहाँ पाईप लम्बे करते रहे पान...

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तुम्हे घर का कहूं या मेहमान

शुक्रवार, दिसंबर 30, 2011

तुम्हे घर का कहूं या मेहमान घोड़े,ऊँट और हाथी नहीं रहे अब तोफें हो गई मौन है झर्झरपन पर रोज बिलखते उन महलों का मालिक कौन है कचोटता है मन आज ...

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महल का विराना

शुक्रवार, दिसंबर 30, 2011

महल का विराना कुछ देर रतनसिंह महल के झरोखे में बैठ आया सुकून के साथ जी आया कुछ पल भव्य लेकिन झर्झर इमारतें तैरती रही आँखों में देर तलक शाम क...

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अब और हम छुपाएं क्या

शुक्रवार, दिसंबर 30, 2011

अब और हम छुपाएं क्या महंगाई के ग्राफ में उलझा ये कमरा नहीं किराए का यूं ही बिखरी पड़ी रहती है पुस्तों की मेहनत खुले में आते ही नहीं कोई जौहर...

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मस्टररोल की हाजरी

शुक्रवार, दिसंबर 30, 2011

मस्टररोल की हाजरी मदन-मोहम्मद,घासी-गीता इसी भांत के कुछ मजदूर विक्रम-बेताल से कन्धों पर बैठ चढ़े-उतारे गीली रस्सी,बांस अनेक लटके घंटों लक्कड...

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अब अकुलाते है मुद्दे समाज के

शुक्रवार, दिसंबर 30, 2011

अब अकुलाते है मुद्दे समाज के किराए के मकान की लम्बी और चौड़ी छत उजाला पसरता है जहां किले की ओट से निकले सूरज के बूते खैरात में बंटे लड्डू सा...

 
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