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13 सितंबर, 2012

कुछ नई कवितायेँ-4

Photo by http://mukeshsharmamumbai.blogspot.in/
(1)
जलती हुयी
सचेत लालटेन की
रोशनी से बेखबर
कोनों में पसरी थी
चुनिन्दा उदासियाँ 

इस तरह
जाने कब से
रह रहे थे
चुपचाप
हमारे ही बीच
कुछ बेखबर लोग

बिना बताये
हंसी की आड़
में रोते हुए
कुछ चेहरे
मुस्करा रहे थे 
कई दिनों से 

आज बतियाये
तो दर्द जाना
हमने 
रोते चेहरों,अकेलापन भोगते कौनों
और
उन उदासियों का
जो अब तनिक खुश थी  


(2)
सुना है जब से
एक बयान
किसी परिचित
ज़बान का  

पहाड़ सी
ऊँचाई वाली
दर्दनाक कहानी
सच
लगने लगी है

कहानी जो
बमुश्किल
किसी हँसते हुए चेहरे
से
आहिस्ता-आहिस्ता
निकल
दबे पाँव पहूंची
इधर तक

(3)
इधर देखा तो
लगने लगा

कि
धरती,आकाश और
बादलों के भी अपने दु:खड़े हैं

बहती नदी का कोई कोना
उदास होने की वज़ह
जुटा ही लेता है
येनकेन

हरियाले पेड़
हमेशा
हंसा नहीं करते  हैं

इस तरह
बदल रही है
तयशुदा परिभाषाएं
जो अब तक
ज़माने में
सांचे की तरह उपयोगी थी

ताज़ा अंदाजा हुआ है कि
खुशी नहीं रहती
हर वक़्त
आलीशान इमारतों में

खबर ये भी है कि
घूम रहे हैं मोहल्ले में
कुछ लोग इन दिनों
मन के हर भाव पर नई-नई परतें
चढ़ाए हुए
नाटकबाज की तरह

पता लगा है कि
फूलों की भी अपनी
उदासियाँ होती हैं
और
तय हैं थोड़ी
गुलामी सहित पिंजरे का सफ़र
आज़ाद उड़ते हुए
पंछियों के लिए

सच पता लग ही गया आखिर
कि
दर्द भरे फर्शों पर
बिछाई है परिचितों ने
कितने सलीके से
ये रंगीन कालीन
हमें भरमाते हुए
चेहरों सहित
हँसते,मुस्कराते
बतियाते 

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