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18 नवंबर, 2020

डॉ. माणिक का शोध आलेख : “दलित आत्मकथाओं में चित्रित सामाजिक यथार्थ और उनका ताप” @‘मधुमती’ (नवम्बर 2020)


राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर की ‘मधुमती’ पत्रिका के नवम्बर 2020 अंक में प्रकाशित डॉ. माणिक का शोध आलेख 


दलित आत्मकथाओं में चित्रित सामाजिक यथार्थ और उनका ताप” 


दलित साहित्य की चर्चित बहस ‘सहानुभूति या स्वानुभूति’ का साहित्य पर बीते दो दशक में काफी तर्क-वितर्क हुए हैं और निष्कर्ष सरीखा आज तक भी कहाँ कुछ निकल पाया है। यह चर्चा आज भी ज़रूरी है। प्रसिद्ध और प्रतिबद्ध लेखक-सम्पादक पंकज बिष्ट के अनुसार भोगा हुआ यथार्थ नई विचारधारा नहीं है। पहले भी इस तरह का साहित्य रचा गया है। अच्छा साहित्य जो कहीं भी लिखा गया है वह हमारे लिए मान्य हैं, हम उसमें अपना दुःख, दर्द ढूंढते हैं। फ्रांसीसी लेखक बांजा, जो सामंती व्यवस्था में रहता है लेकिन जब लिखता है तो सामंती व्यवस्था के खिलाफ ही लिखता है। अगर इस तरह से साहित्य रचा गया तो पायलट ही जहाज के बारे में लिख सकता है, रसोईया ही पकवान के  बारे में लिख सकता है, बैलगाड़ी चालक ही बैलगाड़ी के बारे में लिख सकता है। इस तरह साहित्य की रचना नही होती। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे तुलसीराम के अनुसार आत्मकथाको छोड़कर कोई भी लेखक, गैरदलित अन्य साहित्यिक विधाओं में दलित जीवन का चित्रण कर सकता है और उसे दलित साहित्य ही माना जाना चाहिए।”[i] इस तरह से प्रो. तुलसीराम कुछ प्रगतिशील रवैया अपनाते हैं। शायद यही कारण है कि तुलसीराम की आत्मकथा के दोनों भाग बाकी दलित आत्मकथाओं के बरक्स ज्यादा चर्चित और स्वीकारे गए।

 

सूरजपाल चौहान अपनी आत्मकथा संतप्त में लिखते हैं कि “हिंदी में दलित लेखन की जैसी पहचान उसकी आत्मकथाओं से है वैसी उसकी कविताओं-कहानियों से नहीं। वे आत्मकथाएँ ही हैं जिन्होंने हमारे हाथों को हमारे मुँह, हमारी नाक और कानों से खींचकर अलग किया और हमारी आँखों में अपनी उँगलियां घुसेड़कर कहा कि जिस हिन्दू समाज के तुम नियामक हो, उसी में हम भी रहते आ रहे हैं हजारों वर्षों से; हमें देखो, सुनो और शर्म करो। यह उनकी पीड़ा, संघर्ष और क्रोध का मिला-जुला अभिनव स्वर था साहित्य के जनतंत्र में, जिसे न पहले देखा गया न सुना।”[ii] इस तरह एक दलित लेखक अपनी अब तक की अनसुनी बात को ही उकेरकर पुरजोर तरीके से समाज के सामने रखता है। यही यथार्थ है जिसमें कल्पना नहीं इतिहास जैसा ताप है। हाँ पाठक समाज यह मानकर ही चलता है कि आत्मकथा का लेखक पूरी लेखकीय ईमानदारी से सच लिख रहा है। यही उससे अपेक्षा भी रहती ही है।

 

लगभग सभी प्रमुख दलित आत्मकथाओं में चित्रित समाज और उसका यथार्थ हमारी आँखें खोलता है। वह हमें आईना दिखाता है। मनुष्य होने के नाते एक वर्ग विशेष के साथ हमारे दोगले व्यवहार पर हमें शर्मिन्दा होने पर लाकर छोड़ता है। “आत्मकथाओं के केंद्र में लेखक का निजी जीवन होता है, समाज उसके साथ चलता है। इसलिए यथार्थत: आत्मकथा का तात्पर्य केवल लेखक के निजी जीवन की झाँकी मात्र नहीं है, अपितु वह लेखक के समकालीन सामाजिक एवं युगीन स्थितियों, परिस्थितियों व परिवर्तनों का आईना होती है। लेखक उनसे प्रेरित और प्रभावित होता है तथा वह अपना प्रभाव भी उन पर छोड़ता है।”[iii] खासकर दलित साहित्य के सन्दर्भ में आत्मकथा लेखन के बारे में कहते हैं कि यह समूचे समाज का सामूहिक बयान माना जाए।

समाज है तो समस्याएँ रहेंगी मगर बेहतर करने की मंशा के साथ सभी वर्ग आगे आएँ तो यह परिदृश्य बदला जा सकता है आपसी गैर-बराबरी को कुछ हद समाप्त कर इसे बेहतर किया जा सकता है। आपसी सामंजस्य से प्रत्येक उत्पीड़न का हल है। आज के समाज में अधिकांश समस्याएँ आपसी गलतबयानी और गलतफहमियों की वजह से भी मौजूद हैं। आपसी संवाद की गुंजाइश लगातार कम हुई है। समाज अक्सर खेमों में बँटा हुआ अनुभव हुआ। शोषक और शोषित के अपने-अपने गणित हैं। समीकरण हैं और परिभाषाएँ हैं। मान्यताएँ हैं। हालात बेहतरी की तरफ बढ़े, यह सभी की समान रूप से जिम्मेदारी है, तभी एक सशक्त देश का सपना पूरा हो सकेगा। जानेमाने दलित आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी लिखते हैं कि “आज दलित साहित्य और दलित समुदाय के समक्ष जो चुनौतियाँ हैं वह भारतीय समाज की चुनौतियाँ भी हैं। भारत का लोकतंत्र मजबूत रहे तो इन समस्याओं से पार पाया जा सकता है। जब संविधान पर, संवैधानिक संस्थाओं पर, परम्पराओं पर संकट के बादल गहराते जा रहे हों तो लोकतंत्र, दलित समुदाय, दलितेत्तर समुदाय संकट की जड़ से बाहर नहीं हो सकते। डॉ. अम्बेडकर ने जिस समतामूलक न्याय आधारित समाज का सपना देखा था और उस सपने को पूरा करने की मुहीम आरम्भ की थी उसे संगठित होकर नई ताकत से आगे बढ़ाने की ज़रूरत है। शिक्षा और चिकित्सा सेवाओं का निजीकरण अंतत: वंचित तबके पर कहर बनकर टूटेगा। अभी यह प्रक्रिया घटित होती दिख रही है।[iv] असल में हमें विभिन्न समकालीन समस्याओं के हल खोजते समय अम्बेडकर के आलोक में सोचना और समझना ही होगा तभी समतामूलक समाज का निर्माण पूरा हो सकेगा।

 

नामचीन दलित आलोचक मोहनदास नैमिशराय ने अपनी आत्मकथा अपने-अपने पिंजरे  में लिखा कि “बस्ती में अधिकतर कच्चे ही घर थे पर बेतरतीब से बने हुए ना थे। कोई घर छोटा था कोई बड़ा। आधे मकानों की तो छतें ही टूटी हुई थी। उन दिनों छत बनाने के लिये लकड़ी की कड़ियाँ डाली जाती थीं। कड़ियों के उपर तख्ते। फिर मिट्टी और नीम के पत्ते। बाद में ऊपर से छत गोबर और मिट्टी से लीप दी जाती थी। छत से पानी बहने के लिये नाली के मुँह पर आधा फीट का पथालाना लगा दिया जाता था जिससे पानी दीवार में न भरे। बारिश के दिनों में उससे बड़ी बचत होती थी। किसी घर के आँगन होता था किसी के नहीं।[v] वर्णित अंश के अलावा भी यही दृष्टिगत हुआ है कि अमूमन रूप से दलित आत्मकथा लेखन में आर्थिक हालात बड़े भयावह है। वैसे भी ग़रीबी अकेले कहाँ आती है वह अपने साथ दर्जनभर मुश्किलें साथ लाती है। अमूमन रूप से दलितों के साथ किया गए भेदभाव का मूल उनके जातिगत पेशे थे जिन्हें अस्वच्छ काम माना गया था। जैसे चमड़े से जुड़ा काम। प्रो. श्यौराज सिंह बेचैन की आत्मकथा मेरा बचपन मेरे कन्धों पर के अनुसार “बबूल से छाल उतार कर सुखाना, फिर हाथ-गंडासा से बारीक-बारीक कस्सा काट कर उसे मूँज से सिली गयी खाल में भरा जाता था। उसमें स्वच्छ जल, कस्सा, कलई आदि भरकर उसे पकाया यानी शोधन प्रक्रिया से गुज़ारा जाता था। उसके बाद ही चमड़ा सार्वजनिक उपयोग के लायक बना दिया जाता था।”[vi]

 

दिल्ली में साल 2019 में हुए पहले दलित लिटरेचर फेस्टिवल में एक इंटरव्यू के दौरान प्रो. बेचैन ने बताया कि ऐसा नहीं हैं कि अब मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर बन गया हूँ तो भेदभाव नहीं होता अब दूजी तरह का छुआछूत कायम है। मानसिकता बदलने में वक़्त लगेगा। लगभग ऐसा ही वाकया ओमप्रकाश वाल्मीकि के साथ हुआ जिसका हवाला उन्होंने जूठन के पहले भाग में दिया है कि “हम चूहड़े-चमारों के कपड़े नहीं धोते, न ही इस्तरी करते हैं। जो तेरे कपड़े पे इस्तरी कर देंगे तो तगा हमसे कपड़े न धुलवाएँगे, म्हारी तो रोजी-रोट्टी चली जा गी...”[vii] इस जातिगत भेदभाव का ज़हर हमारे मानस में कितना गहरे तक बैठा हुआ है इसका सहज अंदाज़ लगाया जा सकता है। इस अनुभूति से लेखक कैसे बाहर आया होगा? आप सिर्फ अंदाज़ लगा सकते हैं महसूस नहीं कर सकते। यह सब भोगे हुए यथार्थ का बखान है। वहीं आत्मकथा के दूसरे भाग में वाल्मीकि ने साफ़ तौर पर लिखा कि “इस तरह मुझे फिर एक बार जीवन के उन गहन दंशों से गुजरना पड़ा था, जिन्हें भोगकर मैं यहाँ तक पहुँचा था। सचमुच जूठन  लिखना मेरे लिए किसी यातना से कम नहीं था। जूठन  के एक-एक शब्द ने मेरे ज़ख्मों को और ज्यादा ताज़ा किया था, जिन्हें मैं भूल जाने की कोशिश करता रहा था।”[viii] जूठन के विवरण साफ़ संकेत करते हैं कि अतीत को लिखना बहुत  दुखद सफ़र है क्योंकि भोगा हुआ सच वाकई असह्य था।

 

दलित साहित्य के लिए मिलने वाली वैचारिक खुराक के स्रोत पर प्रो. मैनेजर पांडेय कहते हैं कि “यह बहुत दु:खद है कि अछूतानंद के बारे में, उनके लेखन और विचारों के बारे में लोग बहुत अधिक नहीं जानते हैं। हाल ही के दिनों में उन पर कुछ दलित लेखकों ने लिखा और उनके महत्त्व को सामने लाने की कोशिश की है, बहुत पहले चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु ने अछूतानंद के जीवन और रचनात्मक तथा आंदोलनात्मक प्रयत्नों पर एक पुस्तक लिखी थी जिसको अब दलित लेखक याद करने लगे हैं। हिंदी के दलित साहित्य के उभार के विलंब का कारण इस क्षेत्र में फुले या अम्बेडकर जैसे किसी विचारक का न होना ही है।”[ix] इस तरह प्रो. मैनेजर पांडेय तयशुदा मानकों से कुछ भिन्न राय रखते हैं और अपने तर्क देकर दलित साहित्य को दिशा भी देते रहे हैं। यहाँ लेखिका डॉ. अर्चना वर्मा का मानना है कि “दलित लेखन सिर्फ एक वर्गीकरण है, आरक्षण सरीखा विशेषाधिकार नहीं। जीवन हर लेखक के सामने समूचा खुला पड़ा है, वह कहीं से भी अपनी विषयवस्तु उठा सकता है, किसी विशेष वर्गीकरण में रखा जाय अथवा नहीं। प्रेमचंद, निराला, राहुल सांकृत्यायन आदि जिनका नाम आपने लिया है वे अपने समाज से बेहद नज़दीक से जुड़े हुए लोग थे। ठाकुर का कुआँ, सद्गति, चतुरी चमार, जैसी रचनाओं में अनुभूति की प्रामाणिकता में संदेह का कोई कारण मुझे तो नहीं दिखता।”[x] तो हिंदी साहित्य के आलोचना जगत में दलित साहित्य को लेकर दो तरह की राय लिखी-पढ़ी जाती है।

 

सामाजिक कार्यकर्ता भँवर मेघवंशी राजस्थान में दलित आन्दोलन पर एक आलेख में बहुत ज़रूरी बात लिखते हैं कि सन 2000 के बाद कई प्रकार की गतिविधियाँ हुईं, पश्चिमी राजस्थान में छुआछूत व भेदभाव को लेकर उन्नति नामक संस्था ने एक व्यवस्थित अध्ययन किया, इसी प्रकार से ‘एक्शन एड’ नामक फंडिंग एजेंसी ने अनचेबिलिटी इन इंडिया नामक व्यापक शोध किया, जिससे ज़ाहिर हुआ कि राजस्थान में बहुत सारे रूपों में अन्याय, अत्याचार, उत्पीड़न, भेदभाव व शोषण मौजूद है। मसलन सार्वजनिक स्थानों पर पानी नही लेने देना, मंदिरों में नहीं घुसने देना, हेयर कट नहीं करना, दूल्हा दुल्हनों को घोड़ी पर नहीं बैठने देना, अच्छे कपड़े और आभूषण नहीं पहनने देना, साईकल पर बैठकर गैर दलित रिहाइशों से नहीं निकलने देना, यहाँ तक कि अपने बच्चों के सुंदर नाम नहीं रखने देना जैसे कई तौर तरीके सामाजिक जीवन का हिस्सा बने हुए थे और आज भी हैं। अब उत्पीड़न और सघन हो गया है, वह अपने क्रूरतम स्वरूप में दिख रहा है।[xi]

 

वंचितों के पक्ष में जीवनभर लिखते हुए सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर हिस्सेदारी करने वाली रमणिका गुप्ता ने सक्रीय दलित लेखक शरण कुमार लिम्बाले के बारे में लिखा कि “दलित चेतना के विकास का जीता-जागता उदाहरण स्वयं लिंबाले हैं। उनका साहित्य दलित सोच का विकास है। वे केवल आत्मकथा लेखक नहीं एक इतिहासज्ञ एवं एक दलित चिन्तक भी हैं। उन्होंने अपने जीवन के विकास के साथ-साथ दलित चेतना और उसके साहित्य को विकसित होते देखा है, महसूसा है, या यूँ कहूँ उन्होंने इस विकास को जिया है।”[xii]

 

पिछड़े समाज से सम्बद्ध तेजपाल सिंह धामा द्वारा दलित पात्र के साथ भेदभाव का एक वाकया इस तरह है जो धामा की आत्मकथा अग्निचक्र में हैलेखक बताता है कि “मैं गाँव के प्राइमरी स्कूल के कक्षा तीन का छात्र था। मेरा सबसे प्रिय सहपाठी गुरुवचन था। एक दिन यह मेरे साथ मेरे घर चला गया। माँ ने मेरे साथ उसको भी खाना खिला दिया। मेरे दादाजी ने मेरे मित्र से पूछा- तुम किसके बेटे हो? मेरे मित्र ने सहज भाव हाथ जोड़कर जवाब दिया- बाबा मैं तो चमार का हूँ। फिर क्या था? मेरे दादाजी तो मुझ पर बरस पड़े- म्लेच्छ चमारों से यारी करता है। जिस कटोरे में मेरे मित्र ने साग खाया था, दादाजी ने वह उठाकर सड़क पर फैंक दिया।[xiii] संभवतया इस तरह का भेदभाव अब नहीं होता होगा मगर यह सच है कि अब भी समाज के मानस में इस तरह के भेद की जड़ें बहुत गहरे में हैं। हाँ, नई पीढ़ी जो ग्रामीण परिवेश से बाहर आ शहरों में बसने लगी है या काम धंधों के कारण शहर आ गयी वहाँ ज़रूर छुआछूत कुछ कम है।

 

परेशानी एक नहीं है, दलित समाज में बहुतेरी मुश्किलें हैं जिनका जिक्र गाहे-बगाहे विभिन्न दलित आत्मकथा में आया हैं  “एक औरत कहाँ-कहाँ लड़े ? घर में भोजन के लिए, स्कूल में समानता और अस्तित्व के लिए एवं बस्ती में समाज बिरादरी में अपने को स्थापित करने के लिए। कितना संघर्ष कितनी तकलीफें हैं? नारी जीवन में। ऐसा लग रहा था कि शादी के बाद कौसल्या जी के जीवन में खुशहाली आएगी और आमों पर मंजरियाँ लगेगी। पर जीवन साथी के सारे रंग एक के बाद एक दिखाई देने लगे। ऐसा नहीं कि नारी को जन्म से शादी तक के जीवन में ही तपती रेत में पॉपकोर्न की तरह उछलना पड़ता है, वह तो मृत्युपर्यंत अपने नारीपन का कर्ज घर, परिवार व समाज को साँस दर साँस चुकाती रहती है शूद्र और उस पर भी लड़की होने के दंश को पल-पल भोगते कौसल्या जी ने अनेक-अनेक उम्मीदों और सपनों के साथ देवेन्द्र कुमार से विवाह किया। वे लिखती हैं कि उसने मेरी इच्छा, भावना और ख़ुशी की कभी कद्र नहीं की। बात-बात पर गाली, वह भी गन्दी-गन्दी और हाथ उठाना। मारता भी था बहुत क्रूर तरीके से। जैसे-जैसे हाथों की मेहंदी का रंग उतरता गया वैसे-वैसे देवेन्द्र कुमार के सारे रंग दिखाई देने लगे। पति कभी घर की समस्या या अन्य किसी बात पर कौसल्या जी से अधिक वार्तालाप नहीं करता है।”[xiv] कैसा भयावह दृश्य है। जीवन दूभर है। यह भी हमारे समय का सच है। इसे ही कहते हैं शिकंजे का दर्द। जन्म से लेकर पढ़ने-लिखने की जिद के चलते दर्जनों समस्याओं से मुकाबला करती सुशीला टाकभौरे ने पूरे हौसले के साथ अपने जीवन-संघर्ष को पार किया है।

 

असल में जब हम दलित साहित्य के चुनिन्दा आत्मकथा पढ़ेंगे तो पाएँगे कि जिस तरह का समाज हमने रचा या समाज में एक वर्ग विशेष के साथ जैसा बर्ताव किया गया, आज समूची मानवता को शर्मसार करता है। कारण चाहे जो भी हों भले सत्ता का संघर्ष हो या वर्चस्व की लड़ाई। स्थिति बड़ी चिंतनीय रही है। जो घटित हुई वही लिखा गया या उसके आसपास का सत्य उकेरा गया है। सच से हम मुहँ नहीं फेर सकते हैं। आत्मकथाओं में वर्णित समाज की हकीक़त हमें अपनी जीवन शैली पर पुनर्विचार करने और मानवीय व्यवहार पर कुछ रुककर चिंतन करने के लिए बाध्य करती है। हिंदी की दलित आत्मकथाओं ने अपने उत्पीड़न की मर्मान्तक पीड़ा से साहित्य के पाठक को अवगत कराया हैंअपने अपने पिंजरे  से लेकर मणिकर्णिका और गेबरहा  तक दलित आत्मकथा लेखन ने लम्बी यात्रा तय की है। उल्लेखनीय है कि भदेसपन के आरोपों का सुर मणिकर्णिका तक आकर बदल गया है। स्वयं इन आत्मकथाओं का भी आक्रोश प्रतिशोधपूर्ण आक्रामक स्वर आगे चलकर गंभीर और निष्पक्ष हुआ है। यह दलित आत्मकथा का स्पष्ट विकास दर्शाता है। इन आत्मकथाओं ने दलित जीवन की मूलभूत समस्याओं को भलीभाँति उजागर किया है। उत्पीड़न, शोषण, गरीबी, अशिक्षा, जातिभेद, अस्पृश्यता, अंधविश्वास, कुप्रथा, पिछड़ापन, अज्ञानता, आतंरिक जातिवाद आदि ऐसी प्रमुख समस्याएँ हैं जो हमें लगभग सभी आत्मकथाओं में समान रूप से दिखायी देती हैं। ये आत्मकथाएँ सामाजिक विषमता, विसंगति के साथ व्यक्ति की उत्कट जिजीविषा को भी सामने लाती है।[xv] इन्हीं सब दृष्टिकोणों से बाक़ी साहित्य से दलित साहित्य कुछ जुदा अनुभव होता है। जैसे मणिकर्णिका  में एक और बारीक संकेत प्रो. तुलसीराम ने किया वह यह कि “धीरे-धीरे क्लास(वर्ग) तथा कास्ट (जाति) की अवधारणा समस्याजनक होकर मेरे सामने आने लगी।

 

व्यावहारिक रूप में मुझे यह अनुभव होने लगा कि मार्क्स जिस मजदूर वर्ग की बात करते थे, उसका अधिसंख्य हिस्सा भारत में सामाजिक भेदभाव का शिकार दलित समाज से आता था। शायद कम्युनिस्ट पार्टी का ध्यान इस प्रश्न पर नहीं जाता था।”[xvi] इस तरह तुलसीराम खुद कम्युनिस्ट पार्टी में होकर भी उससे किसी मुद्दे पूरे मतभेद होने पर बहस करते थे। अपनी बात साफगोई से रखते थे। यह दलित वर्ग की पीड़ा है कि सभी राजनीतिक दलों ने उसका इस्तेमाल ही किया है। किसी ने असल रूप में उनकी समस्याओं को मूल रूप में समझने की कोशिश नहीं की।

 

जीवनभर दलित लेखक-आलोचक होने के साथ पत्रकारिता में इस वंचित वर्ग की पीड़ा को स्वर देने वाले मोहनदास नैमिशराय लिखते हैं कि “दलित लेखक को लेकर ये सारे प्रश्न, आरोप, आशंकाएँ और सद्भावनाएँ अनेक बार उठेंगी और रामचंद्र शुक्ल से लेकर रविन्द्र वर्मा तक इस ‘फूहड़’ और अधकचरे को खारिज करने के तर्क तलाश करेंगे। पता नहीं, इसके पीछे कुरूप और कुरुचिपूर्ण को न देख पाने की जुगुप्सा है, अपने ही बीच इस दुनिया के बने रहने का अपराधबोध है या उनके होने के बचे रहने की साहसहीनता। कुछ भी कहें, दलित आत्मकथाओं ने सवर्ण समाज के ठहरे हुए पानी को हिला ज़रूर दिया। भविष्य में और भी आत्मकथाएँ आएँगी जो सवर्ण और सनातनी समाज को और भी ज़ोरदार ढंग से झकझोरेंगी। यही दलित आत्मकथाओं की उपलब्धियाँ होंगी।[xvii]

 

भारतीय परिवेश में जाति एक बहुत ज़रूरी संप्रत्यय है जिसके बहुत गंभीर और ख़ास मायने हैं। “अपने अपने पिंजरे थोड़ा सा इस रीति-नीति से हटी हुई आत्मकथा है। दरअसल यह एक प्राचीन समाज की एक ऐसी जाति की कथा है जिसमें व्यक्तिगत अनुभव को जातीय अनुभव से अलग करके पढ़ना एक निरर्थक पाठकीय प्रयास हो सकता है। वहाँ व्यक्ति की मात्र इतनी पहचान है कि वह इन अनुभवों को लिपिबद्ध करने वाला एक व्यक्ति है। इसलिए मराठी के विख्यात दलित कथाकार बाबुराव बागुल ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि मेरा साहित्य मेरे समय का साहित्य है। मैं जब पढ़ने लगा तब शम्बूक की कथा, एकलव्य की कथा मेरे कानों में पड़ी और बालपन में मेरे मन पर इन कथाओं का एक प्रभाव पड़ चुका था। इसी आधार पर मेरी आगे की मानसिकता तैयार हुई। मेरा आगे का लेखन इसी मानसिकता का परिणाम है। आत्मकथाओं में समूचा इतिहास आता है, संघर्ष आता है और आते हैं दहकते हुए अनुभव। जैसे लोहा भट्टी में जाने के बाद कुछ बनता है, ऐसे ही दलित कथाकार समाज में तैयार होता है।[xviii] लेखक की शब्दावली में ही उनके जीवन के कड़वे अनुभवों का ताप महसूस कर सकते हैं। यह सबाल्टर्न थ्योरी का एक संकेतभर है।

 

यह भी एक बड़ा सत्य है कि आत्मकथा साहित्य का पर्याप्त विकास होने के बावजूद साहित्य की दुनिया में इस विधा को बहुत अधिक महत्व प्राप्त नहीं हुआ। इसी सन्दर्भ में दलित आत्मकथाओं का विकास एक बड़े परिवर्तन का संकेत है। हालाँकि आदिकाल से ही दलित चेतना के तत्व मौजूद रहे मगर असल में इसकी वैचारिकी अम्बेडकर के प्रभाव से ही फलीफूली। एक हज़ार साल के हिंदी साहित्य में आधुनिक काल तक आते-आते ही दलित साहित्य को लेकर हालात कुछ उनके पक्ष के बन पड़े। यही यथार्थ था जिससे मुहँ नहीं मोड़ा जा सकता था।

 

दलित आत्मकथाओं में छिपी कई परतें हैंसमाज का एक दूजा पक्ष भी है जिसका जिक्र लाजमी है “भूख, गरीबी, भेदभाव, अशिक्षा, पिछड़ापन, अंधविश्वास, शोषण, उत्पीड़न, कुरीतियाँ, झाड़-फूँक आदि जादू-टोना ग्रामीण समाज का वह स्याह पक्ष है, जो अधिकांश दलित आत्मकथाओं में वर्णित है किन्तु इसी ग्राम्य भूमि के लोकधर्मी सांस्कृतिक स्वर भी हैं, जिसकी हिंदी की प्रारम्भिक आत्मकथाएँ अधिक चर्चा नहीं करतीं। दलित लेखन ग्रामीण जगत के नकारात्मक पक्ष को अनेकविध उजागर करता रहा, जो ज़रूरी भी था, किन्तु इस लोक जीवन में रचे बसे कई जीवंत सांस्कृतिक तत्व थे जिसने सदियों के उत्पीड़न को लोक संस्कारों द्वारा उबरने की जीवट शक्ति दी। हिंदी की आरंभिक दलित आत्मकथाओं में इसके संकेतभर आने के बाद डॉ. तुलसीराम कृत मुर्दहिया ने लोक संस्कृति, लोक पात्रों, लोकभाषा, लोकोक्तियों, गीत, नृत्य, कोहबर कला के साथ मनुष्य के जीवंत सबंधों को व्यापक रूप से दिखाया। निश्चित ही दलित अपनी पीड़ा और संघर्ष का विरेचन इन लोक माध्यमों से ही करते रहे होंगे।”[xix] अपने दुःख-दर्द को भुलाने के इन माध्यमों की अपनी परम्पराएँ हैं। भारतीय संस्कृति के आकाश पर लोक की यह बड़ी छाप भी बहुत सारा स्थान घेरती है। मुर्दहिया में एक जगह लिखते हैं कि “हमारा परिवार संयुक्त रूप से वृहद होने के साथ-साथ वास्तव में एक अजायबघर ही था, जिसमें भूत-प्रेत, देवी-देवता, सम्पन्नता-विपन्नता, शकुन-अपशकुन, मान-अपमान, न्याय-अन्याय, सत्य-असत्य, ईर्ष्या-द्वेष, सुख-दुःख आदि-आदि सब कुछ था, किन्तु शिक्षा कभी नहीं थी।”[xx] दलित वर्ग की सबसे बड़ी समस्या और कहें कि सभी मुसीबतों की जड़ निरक्षरता है। माना गया है कि जैसे-जैसे शिक्षा आएगी समाज सभ्य और संस्कारित बनेगा साथ ही गुणवत्तापूर्ण जीवन में विश्वास करने लगेगा। तमाम अंधविश्वासों के मूल में भी अशिक्षा ही तो है।

मराठी साहित्य का जूठन  के लेखन में असर के बारे में प्रश्न का जवाब देते हुए प्रसिद्ध दलित कवि-कहानीकार और आलोचक ओमप्रकाश वाल्मीकि कहते हैं कि “नहीं ऐसा नहीं है। चीज़ों को समझने की तकनीक इन लोगों से सीखी है। दया पवार से, लिम्बाले से, प्रेमचंद से, गोर्की से, चेखव से, जेम्स वाल्डविन से, आज भी मुझे रिचर्ड राइट प्रभावित करता है, दूसरा कोई नहीं। अपनी बात को कैसे कहें छोटे-छोटे वाक्यों में। रिचर्ड राइट का भी वही कमाल है, वाक्य होते हैं, लेकिन छोटे-छोटे होते हैं। यह जानने की ज़रूरत है कि भाषा को प्रभावशाली कैसे बनाया जाता है और उसका प्रस्तुतीकरण कैसे करना होता है। वही रचना को मजबूत बनाता है। मुझे लगता है कि जूठन में मैंने सहज रूप में यह इस्तेमाल किया है। छोटे-छोटे वाक्य हैं, ज्यादा लम्बे वाक्य नहीं हैं और भाषा प्रभावशाली है।”[xxi] तो यहाँ दलित साहित्य में भाषा और शिल्प सहित इसके सौन्दर्यशास्त्र को लेकर वक़्त-बेवक्त चली बहस को एक जवाब यह भी है। सारे दलित लेखकों को एक सरीखा मानकर घेरना या खारिज करना भी उचित नहीं है।

 

यह हम पर है कि दलित आत्मकथाओं में आया सत्य हम किस तरह से स्वीकारते हैं। इतने बड़े स्तर और लगातार सभी प्रदेशों में विभिन्न भाषाओं में उभर रहा यह दलित साहित्य गंभीरता से समझने और विमर्श का विषय है। खासकर हिंदी की दलित आत्मकथाओं में बहुत बेबाकी से बयान दर्ज किए गए हैं, इन्हें पूरे समाज का सत्य या सामूहिक बयान माना जाना चाहिएदलित आत्मकथाएँ केवल व्यक्तिगत जीवन की एक त्रासदीभर नहीं हैं, ये सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश की क्रूरता पर प्रश्न चिह्न हैं। अभिजात्य या कुलीन मानसिकता द्वारा उत्पन्न अमानवीय परिस्थितियों का आख्यान हैं तथा उसकी क्रूर निष्ठुर हो चुकी संवेदनाओं को झकझोरने का प्रयत्न हैं। यह राजनीतिक शक्तियों को दिया जाने वाला मानवीय एजेंडा है, तो साथ ही साहित्य की कलात्मकता में दलित के प्रति सोई हुई संवेदनशीलता को जगाने का प्रयास भी है। वास्तव में दलित चिंतन पर लगने वाले आरोपों-प्रत्यारोपों के विरुद्ध आत्मकथाओं में वर्णित अमानवीय स्थितियों में शक्ति का संघर्ष उजागर है, जिसे केवल आक्रोश, रोना कल्पनाभर मान लेना भारी गलती होगी।”[xxii] उपर्युक्त वर्णन को संकेत कहें या उलाहना, समझ से बाहर है। गैर दलित समाज और साहित्य के अन्य खेमों को दलित साहित्य को लेकर फिर से सोचना चाहिए। दलित आलोचकों की अपील है कि अपनी बनी हुई राय पर पुनर्विचार की ज़रूरत है।

 

दलित वर्ग सहित समूचे भारतीय समाज में शराब का सेवन अच्छा नहीं माना जाता है। असल में शराब पीने की आदत के चलते घर-परिवार में कई अन्य मुसीबतें आती हैं। गाली-गलौज और मारपीट आम बात हो जाती है। दोहरा अभिशाप के हवाले से चर्चा करें तो कौसल्या बैसंत्री की गिरस्ती की आर्थिक हालत बड़ी खराब थी। घर-परिवारों में शराबखोरी का जिक्र करते हुए लिखती हैं कि मांग जाति के आदमी शादी विवाह और मृत व्यक्ति को शमशान ले जाते वक्त बाजा बजाने का काम करते थे। पहला बच्चा किसी के घर होने पर भी वे उनके आँगन में आकर बाजा बजाते थे। वे अस्पृश्य के घर में भी बाजा बजाते थे। स्पृश्य लोगों के घरों में त्योहार वगैरह पर आँगन के दूर कोने में बैठकर बाजा बजाते थे। उनकी औरतें  फुर्सत के समय में बाँस की टोकरियाँ, सूप वगैरह बनाकर बेचती थीं। जिस दिन पैसा मिलता था उस दिन मांग लोग खूब शराब पीते थे, बढ़िया खाना खाते, सारा पैसा एक दिन में ही खाने पीने में उड़ा देते थे। उन्हें दूसरे दिन के खाने की चिंता नहीं रहती थी। दूसरे दिन घर में पड़े पीतल के बर्तन वगैरह बस्ती के लोगों के घर गिरवी रखने के लिये विनती करते थे। कभी अपना बाजे का सामान भी गिरवी रखते थे।[xxiii] इसी तरह गिरस्ती धर्म पर एक विवरण यह भी है जहाँ मोहनदास नैमिशराय अपनी आत्मकथा के तीसरे भाग रंग कितने संग मेरे में लिखते हैं कि “मेरे जीवन का भी यह विरोधाभास था। इन दिनों पत्नी से बहुत कम बातचीत होती है। क़रीब एक पखवाड़ा बीत चुका। घर के ही एक कोने में अपनी क़िताबों के साथ सिमटा रहता हूँ जो मेरा अपना संसार है। मेरी अपनी दुनिया है। घर और उसकी दुनिया से तालमेल रख नहीं पा रहा हूँ। यह सच है कि हम दोनों के अलग-अलग संसार थे। अलग विचार थे। अपना-अपना जीवन जीते थे हम अपनी तरह से। कहीं कुछ ज़रूरी हुआ तो बोल-बतिया लिया वरना चुप्पी ही रहती।”[xxiv] पारिवारिक जीवन में इस तरह का अलगाव अमूमन रूप से हर दलित लेखक की आत्मकथा में दृष्टिगोचर हुआ है। इस तरह की त्रासद स्थितियाँ क्यों? यह तमाम प्रश्न अगर हमारे सामने लेकर आती हैं तो दलित आत्मकथाएँ।

 

यह भी समझना बहुत आवश्यक है कि वे कौनसे मूल्य हैं जिन्हें केंद्र में रखकर यह समूचा दलित साहित्य लिखा गया है वे कौनसे विचारक हैं जिनके प्रभाव में यह लेखन अपनी वैचारिक खुराक प्राप्त करता रहा है। किसी भी देश के संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करना उस देश के सभी नागरिकों का कानूनी दायित्व होता है। अब अगर आज़ाद भारत में भी दलित वर्ग के साथ किसी भी तरह का भेदभाव और अन्याय कायम है तो समाज के प्रत्येक वर्ग और जागरूक नागरिक की सामूहिक जिम्मेदारी है कि संविधान बचा रहे। न्याय कायम रहे। सभी को सम्मान से जीने का अधिकार मिले। लम्बे समय तक साहित्य कुछ स्थापित विषयों पर ही लिखा जाता रहा है। दलित साहित्य सामाजिक आन्दोलन का परिणाम है इधर उसका समाजशास्त्रीय अध्ययन एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है। दलित साहित्य का आधार ही दलित की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्थिति है इसलिए मोहनदास नैमिशराय का यह विचार उल्लेखनीय है कि यह हमेशा ध्यान में रखना होगा कि दलित साहित्य का सौन्दर्य विचार अम्बेडकर सोच का प्रतिफल है और दलित साहित्य का सौन्दर्य मूल्य सामाजिक मूल्य है इसलिए वे समता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व के विचार को दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र कहे जाने पर सहमति देते हैं। यह विचार अम्बेडकर-दर्शन का मूल है।”[xxv] यहाँ दलित विमर्श में डॉ. अम्बेडकर का प्रभाव स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। 

 

एक से बढ़कर एक वर्णन इन आत्मकथाओं में भरे पड़े हैं। ब्योरे हैं और यथार्थ की तरह पेश आते हैं। डॉ. रमाशंकर आर्य की आत्मकथा घुटन के सन्दर्भ में जानने योग्य बात यह है कि “दलित लेखन पर एक आरोप लगता रहा है कि वह अपनी बात कह चुका तथा दलित आत्मकथाएँ लगभग एक ही धरातल पर समान समस्याओं को रेखांकित करती हैं, किन्तु वस्तुस्थिति यह है कि अलग-अलग क्षेत्रों से आने वाली ये रचनाएँ दर्शाती हैं कि जातिगत भेदभाव प्रत्येक क्षेत्र में मौजूद हैं। वह गाँव में है तो शहर में भी, निरक्षर में है तो उच्च शिक्षितों में भी, वह विचार में है तो व्यवहार में भी। दरअसल गुण-कर्म की अपेक्षा जन्म-आधारित जाति आज भी समाज में पहचान निर्धारित कर रही है। इस यंत्रणा को इस तरह भी समझा जा सकता है कि जब एक सामान्य व्यक्ति तक अपनी जन्मभूमि की ओर बार-बार लौटना चाहता है, उस मिटटी का स्पर्श करना चाहता है, तब डॉ. रमाशंकर आर्य कहते हैं, गाँव ने मुझे नहीं  छोड़ा है, मैंने ही अपने गाँव को छोड़ दिया है।”[xxvi] यहाँ समूचे भारतीय समाज को सोचना चाहिए कि ऐसी क्या परिस्थितियाँ थीं जिनके कारण डॉ. रमाशंकर को अपना गाँव छोड़ना ही पड़ा।

 

साल 2019 में भँवर मेघवंशी की आत्मकथा मैं एक कार सेवक था  प्रकाशित हुई, जिसकी समीक्षा करते हुए डॉ. राजेश चौधरी ने लिखा है कि हिन्दी पट्टी में दलित आत्मकथा-लेखन महाराष्ट्र की तुलना में देर से शुरू हुआ और अब भी संख्यात्मक दृष्टि से कम है। भँवर मेघवंशी का आत्मकथा पिछले दिनों प्रकाशित हुआ है, जो कि इस अभाव की एक हद तक पूर्ति करता है। इसे लेखक का सम्पूर्ण आत्मकथा कहने के बजाय एक अंश कहना ज्यादा ठीक होगा; क्योंकि इसमें उनकी छठी कक्षा से लेकर 2013 तक के जीवनानुभव हैं। 2013 के बाद एक लम्बी पारी वे और खेलेंगे; उसके दस्तावेजीकरण की प्रतीक्षा हमें रहेगी।मैं एक कारसेवक था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लेखक के जुड़ाव, संघ के जाति आधारित दुराव परिणामत: भँवर का उससे अलगाव, तदनंतर भटकाव और अंतत: एक उचित निश्चय पर ठहराव (टिकाव) को समेटे हुए है। साथ ही इसमें मौजूदा दौर के दलित प्रश्नों, सांप्रदायिकता, राजनीति, धार्मिक पाखंड पर भी तीखी एवं प्रामाणिक टिप्पणियाँ हैं।”[xxvii] तो इस तरह से भँवर मेघवंशी का यह लेखकीय दख़ल हिंदी साहित्य में एक अलग तरह की बहस पैदा करता है। कुल जमा दलित साहित्य में बहसतलब ज्यादा है क्योंकि वह हमारी आँखें खोलने वाला सत्य ज्यादा और साहित्य को मनोरंजन मानने वाली परिभाषाओं को तोड़ता हुआ काम है। दलित साहित्य में अन्य विधाओं के बरक्स आत्मकथाओं पर जितना काम हुआ है वह मानीखेज है। कई दलित लेखकों से मेल-मुलाक़ात के बाद जाना कि बहुत लंबा रास्ता तय करके आज वे इस तरह के मुकाम पर पहुँचे हैं। आज सुशीला टाकभौरे जी कॉलेज शिक्षा में प्रोफेसर पद से रिटायर्ड हुईं तो इधर दिल्ली विश्वविद्यालय में लम्बे संघर्ष के बाद हिंदी विभागाध्यक्ष पद पर प्रो. श्यौराज सिंह बेचैन पदस्थापित हुए हैं। रत्नकुमार साम्भरिया जनसम्पर्क  विभाग में उच्च पदस्थ रहे  हैं। कई उदाहरण हैं। लक्ष्मण गायकवाड़ आज प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में जाने जाते हैं मगर उनका संघर्ष आज भी कम नहीं हुआ है।

 

निष्कर्ष रूप में यही कहा जा सकता है कि अभी तक प्रकाशित भारतीय हिंदी दलित साहित्य में आत्मकथाओं का बहुत सशक्त हस्तक्षेप रहा है। यहाँ प्रस्तुत कुछ विवरण बानगी मात्र हैं। पाठक के मानस पर बहुत गहरा असर डालने वाले ऐसे चित्रण भोगे हुए यथार्थ और ओढ़े हुए यथार्थ की बहस को ही बेमानी कर देते हैं। मनुष्य का विराट संघर्ष व्यवस्था और व्यस्थापक  दोनों को निरुत्तर करता प्रतीत होता है।  

डॉ. माणिक

संस्कृतिकर्मी

कंचन-मोहन हाऊस

1, उदय विहार, महेशपुरम रोड़

चित्तौड़गढ़-312001, राजस्थान

manik@spicmacay.com



[i] अमरेन्द्र कुमार आर्य : स्वानुभूति बनाम सहानुभूति के आइने में साहित्य’, अपनी माटी (अंक 19 दलित-आदिवासी विशेषांक), सितम्बर-नवम्बर, 2015, http://www.apnimaati.com/2015/09/blog-post_47.html

[ii] सूरजपाल चौहान : संतप्त, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2006, पृ. 9

[iii] मोहनदास नैमिशराय : हिंदी दलित साहित्य, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, 2018, पृ. 181

[iv] बजरंग बिहारी तिवारी : सम्पादकीय, कथादेश (दलित साहित्य विशेषांक), सितम्बर 2019, पृ. 5

[v] मोहनदास नैमिशराय : अपने-अपने पिंजरे (भाग एक), वाणी प्रकाशन, दिल्ली,  1995,पृ. 22

[vi] श्यौराज सिंह बेचैन : मेरा बचपन मेरे कन्धों पर, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, तीसरा संस्करण, 2018, पृ. 12

[vii] ओमप्रकाश वाल्मीकि : जूठन (भाग-एक), राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, बारहवाँ संस्करण, 2017, पृ. 28

[viii] ओमप्रकाश वाल्मीकि : जूठन (भाग-दो), राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, तीसरा संस्करण, 2015, पृ. 78

[ix] अतिथि सम्पादक श्यौराज सिंह ‘बेचैन’, सत्ता-विमर्श और दलित विशेषांक, हंस (सं. राजेंद्र यादव)  पृ. 200

[x] अतिथि सम्पादक श्यौराज सिंह ‘बेचैन’, सत्ता-विमर्श और दलित विशेषांक, हंस (सं. राजेंद्र यादव)  पृ. 209

[xi] भँवर मेघवंशी : ‘राजस्थान : दलित अत्याचारों का सामंती किला!’, हंस (दलित विशेषांक-द्वितीय सोपान), दिसम्बर, 2019, पृ. 63

[xii] शरणकुमार लिम्बाले : दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र (मराठी से अनुवाद : रमणिका गुप्ता), पृ. 9

[xiii] मोहनदास नैमिशराय : हिंदी दलित साहित्य, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, 2018, पृ. 182

[xiv] प्रभु लाल वर्मा  : हिंदी में महिला आत्मकथाकारों का आत्मकथा लेखन, ज्ञान प्रकाशन, कानपुर, 2017, पृ. 93

[xv] पुनीता जैन : हिंदी दलित आत्मकथाएँ, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, 2018, पृ. 31

[xvi] तुलसीराम : मणिकर्णिका, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, दूसरा संस्करण, 2015, पृ. 171

[xvii] मोहनदास नैमिशराय : हिंदी दलित साहित्य, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, 2018, पृ. 213

[xviii] मोहनदास नैमिशराय : हिंदी दलित साहित्य, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, 2018, पृ. 178

[xix] पुनीता जैन : हिंदी दलित आत्मकथाएँ, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, 2018, पृ. 33

[xx] तुलसीराम : मुर्दहिया, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पाचवाँ संस्करण, 2016, पृ. 21

[xxi] ओम प्रकाश वाल्मीकि : अंतिम संवाद (भँवरलाल मीणा) बनास जन  (सं. पल्लव),  पृ. 12

[xxii] पुनीता जैन : हिंदी दलित आत्मकथाएँ, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, 2018, पृ. 37

[xxiii] कौसल्या बैसंत्री : दोहरा अभिशाप, परमेश्वरी प्रकाशन, दिल्ली, 1999, पृ. 31

[xxiv] मोहनदास नैमिशराय : रंग कितने संग मेरे, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2019, पृ. 95

[xxv] पुनीता जैन : हिंदी दलित आत्मकथाएँ, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, 2018, पृ. 45

[xxvi] पुनीता जैन : हिंदी दलित आत्मकथाएँ, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, 2018, पृ. 211

[xxvii] राजेश चौधरी : ‘दे और दिल उनको जो न दे मुझको ज़बाँ और’, इकरा (पाक्षिक), 25 दिसम्बर 2019, पृ. 6


सन 2000 से अध्यापकी। 2002 से स्पिक मैके आन्दोलन में सक्रीय स्वयंसेवा।2006 से 2017 तक ऑल इंडिया रेडियो,चित्तौड़गढ़ में रेडियो अनाउंसर। 2009 में साहित्य और संस्कृति की ई-पत्रिका अपनी माटी की स्थापना। 2014 में 'चित्तौड़गढ़ फ़िल्म सोसायटी' की शुरुआत। 2014 में चित्तौड़गढ़ आर्ट फेस्टिवल की शुरुआत। चित्तौड़गढ़ में 'आरोहण' नामक समूह के मार्फ़त साहित्यिक-सामजिक गतिविधियों का आयोजन। 'आपसदारी' नामक साझा संवाद मंच चित्तौड़गढ़ के संस्थापक सदस्य।'सन्डे लाइब्रेरी' नामक स्टार्ट अप की शुरुआत।'ओमीदयार' नामक अमेरिकी कम्पनी के इंटरनेशनल कोंफ्रेंस 'ON HAAT 2018' में बेंगलुरु में बतौर पेनालिस्ट हिस्सेदारी। सन 2018 से ही SIERT उदयपुर में State Resource Person के तौर पर सेवाएं ।

कई राष्ट्रीय सांस्कृतिक महोत्सवों में प्रतिभागिता। अध्यापन के तौर पर हिंदी और इतिहास में स्नातकोत्तर। 2020 में 'हिंदी दलित आत्मकथाओं में चित्रित सामाजिक मूल्य' विषय पर मोहन लाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर से शोध।

प्रकाशन: मधुमती, मंतव्य, कृति ओर, परिकथा, वंचित जनता, कौशिकी, संवदीया, रेतपथ और उम्मीद पत्रिका सहित विधान केसरी जैसे पत्र में कविताएँ प्रकाशित। कई आलेख छिटपुट जगह प्रकाशित।माणिकनामा के नाम से ब्लॉग लेखन। अब तक कोई किताब नहीं। सम्पर्क-चित्तौड़गढ़-312001, राजस्थान। मो-09460711896, ई-मेल manik@spicmacay.com
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