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21 अक्तूबर, 2010

कभी तो कबूलें हकीक़त



कभी तो कबूलें हकीक़त 
कभी तो फेंकें दूर झूंठ की चादर
जी लें कुछ देर 
नाटकबाजी के विरह में 
सोच कुछ ऐसा ही मन में 
आज दी है बचपन को शक्ल 
कवितानुमा शब्दों में ढाला है मैंने
इतिहास है ये साहित्य नहीं
पढ़ना ज़रा संभल के 
ठहरना कुछ देर अगर ज़रूरी लगे 
सोचना तनिक गांवों में धंसी उम्र को 
और लाना ख़याल मन में 
हो सके तो करना ज़िक्र 
कॉफ़ी  हाउसकल्चर में कहीं 
जैसे तैसे बड़े होते बच्चों के 
दमे से लदे फैंफड़ों का 
फसल कटे खेतों में 
बिना जूतों के बचपन ढूँढता था
मूंगफली,सोयाबीन के दाने
और अफीम के बचे-कूचे डोडे
बेचकर औने पौने दाम ही
खुशी हासिल थी मुठ्ठी में उनके
नदी,तालाब,पथवारी की ओर 
जाते रेले में जा रमते थे बचपनिया दिन
याद रही रामरेवाड़ी और नौरात्रि का नेजा
कुछ था धुंधला  इंतज़ार रातीजगे में
देवरे पर बँटने वाले कांसे का भी था 
ना कोई रोकता
ना कोई टोंकता था उन दिनों
खुद ही बनाते-बिगाड़ते जीवन की डगर
गूंथते थे बारम्बार
गीली मिट्टी बचपन की
मन मुताबिक़ शक्ल देते थे
पास या फेल से बड़ा 
कोई झंझट नहीं होता था
ना कोई प्रतिशत की मारा-मारी
निचले मौहल्ले  के कुछ संगी साथी
बच्चे जोत दिए जाते थे 
पूरा कार्तिक मास
खेत,खलिहान और मजूरी में हो तन्मय 
रख बस्ता टांड पर
वो भी भूल जाते थे
ढलान से होकर स्कूल को जाता रास्ता
स्कूली रिपसपट्टी से ज्यादा रुचते थे
जंगली बैर,सीताफल और सितौलिए 
सवेर की दस से गोधूली की छ; तक 
चोपते थे खेतों में लहसून
चूल्हे की खातिरदारी में
पिताजी पेड़ काटते थे
दीदी छूटके को पालती थी
मुर्गी, भैंस और बकरियों का ज़िम्मा
आ पड़ता था बूढ़ी दादी पर आख़िर
दड़बेदार  कांच वाले चश्में से देखती थी 
चलाती थी काम अपना जैसे तैसे 
कभी माँ फसल काटती थी
भूख बेचारी रातभर जागती थी कभी 
प्यास बार-बार गले को नापती थी 
और दिन कटते रहे यूंही
स्कूल की खिड़कियों से झांकने  में ही
कुछ तो उम्र निकल गई थी
बिता बचपन फुर्र सा
यूं लगा कभी आया और गया भी फुर्र से
सब कुछ वैसा ही रहा बरसों तलक 
वही स्कूली इमारत,वही किताबें
उसी कक्षा में उसी खाखी हाफेंट के साथ
पहनना था वही नीला शर्ट
वैसा ही  रहा बस्ता ठेगरेदार
वही खूंटी,वही टांड 
बनी रही सुख दुःख का सहारा 
बस्ते के हित 
साल दर साल मगर बदलते  रहे धंधे
घर,भूख और जीवन के जुगाड़ में
कभी बेचे अखबार,कभी गासलेटी चिमनियाँ
किराने की दूकान का मुनिमपना
तक दिखा लाया मेरा बचपन
याद है वो आलम
बस्तियों के कंधो पर रखी चिमनियाँ
इमारतें चमकाती थी अपनी रोशनी से
हमने रखे घंटों घंटों अपने कंधे पर कभी
रोशनी करते वे मेंटल वाले स्टोव
और बिन्दोली में नाचता उपरला मौहल्ला पूरा
चुभने वाले नजारों में
ऐसे ही कुछ दृश्य थे शामिल
मगर हम असमर्थ  ही रहे
कुछ  भी ना कर सके सीधा 
साइकिल,पैदल और पहियों के बूते
नापी दूरियां हज़ारों मील हमने
बीत गया बचपन का कुछ हिस्सा यूं
माईक मशीन लगाते हुए 
नांगल,मुंडन रातीजगे में
सपने तैरते रहे आँखों में  और दिल बैचेन
रातभर के गीत सुनने पर मिलने वाली
प्रसादी रही निशाने पर बरसों
यूं भरता रहा गीत गांवों में
और रीता रहा खुद ही 
उम्र अधियाने तक 
सोच सोचकर उसी दौर को
आज भी चलता हूँ ज़मीन के आस पास ही
  पुरानी आदत के चलते
बातों में उड़ना आज तक नहीं जान पाया
ना खुलता हूँ हल्केपन से
ना भागता हूँ आफत में आज भी
कुछ तो वैसा ही रहा
कुछ बदला हूँ कोने से
तसल्ली है मन में मेरे
 आज सच कबूलने की
बचपने में ही बुढापा पा गया
पिछे देखा आज मुड़कर फिर से
तो यही कुछ याद आया
जिसे आज जाकर लिखा है खरा-खरा 
उन दिनों के रोजनामचे के नाम 

6 comments:

  1. बहुत भावुक कर गई कविता आपकी.. उठा ले गई बचपने में..

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  2. बहुत बोलने वाला मन एकाएक मूक हो गया है , सटीक चित्रण ...

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  3. aapki is kavita ko mera salam.. aap achanak bahut bade
    kavi ho gaye. mujhe garav hai aap per.
    ashok

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  4. its really nice to read you. you picked up a subject from our day to day life and filled your feelings and emotions in it. its a deep sensitizing poem. accept my compliments for it.

    Jitendra Kumar Soni, IAS
    LBSNAA, Mussoorie
    www.jksoniprayas.com.co.in

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  5. क्या ही वास्तविक शब्द चित्र खींचा है जो अपने साथ बहा कर ले जाता है...बहुत सुन्दर..बधाई

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