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19 अक्तूबर, 2012

पूरी रात

पूरी रात 

जब रात में बीनने बैठा
जीवन का अनाज

दिन के दृश्य टल्ला मारकर
ख़लल डालते नज़र आये
मूँह लगे मित्रों की तरह
घपियाते रहे मुझसे
पूरी रात

मूंह फूलाये दोस्त की तरह
सवेरा हाथ बटाता रहा
अनमने मन से
रिश्ते निभाने की तरह
अधिकार जताता रहा
उजाला
पूरी रात

बू आती रही यहाँ तक
गली के गुलमोहर की
जो कुछ दिनों से उदासमना है
आँगन में सिकुड़े मोगरे के तरह
शोकमग्न
सुबकता रहा
थकाहारा एक पथिक
चंद तारों के भरोसे
नींद खोजता रहा
बिछोने पर लेटे-लेटे
पूरी रात

डालियाँ
सकपकाती रही
आवाजाही से झांकती
शक्लें देखकर
नि:शब्द दुपहरों में
उठे बदन दर्द से
करवटें बदलती रही
कुछ पीठें बिस्तर पर
पूरी रात

फूल से होंठ पर
फिसलती रही बातें रातभर
सुनकर जिन्हें
पड़ौस की पगडंडियाँ
मुस्कराती रही अकेले
पूरी रात

आहिस्ता उतरती रही
सीढ़ियों से चांदनी
चुपचाप अपनी जाजम
बिछाते हुए
छतों को
लगाती रही बातों में
पूरी रात

सलीके से शामें
बुनती रही
रात का स्वेटर
दीवारों पर
दुःख-दर्द और पीड़ा की परछाइयां
मांडने मांडती रही
रातभर

Photo by http://mukeshsharmamumbai.blogspot.in/
सभी पहर
हो सचेत
कुछ कलाविद आँखें
साफ़ चादर पर
आंसुओं से बूटे
बनाती रही
पूरी रात

कहीं झील उबकती रही
खुशी से चौड़ाकर
कहीं विरहीणियां
कुरजां गीत गाती रही
पूरी रात

पूरी पूरी रात
सपने उगाकर
बोराती रही
उनिन्दी आँखें
मिलीभगत की कुछ जुबानें
झूठ उगलती रही
कहीं निर्दोष इमारतें
बड़बड़ाती  रही
सच
पूरी रात


कतार में आख़िरी मौसम की तरह
याद आती रही
दीवार से सटकर
झरती हुयी एक छतरी
आकंठ दुःख में डूबी स्त्री मन सी
बेकल

याद आते रहे
ताड़ियों के नुकीले शीर्ष
और
वहीं से टपकती हुयी
बूंदों में बहती कहानियां

सरसराती हुयी गुज़रती रही
मेरे ठीक पास से
पूरी रात

और इस तरह
मैं उलझा रहा 
इधर उधर के दृश्यों में
रातभर में नहीं बीन सका
अपने हिस्से का जीवन अनाज


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