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28 जनवरी, 2014

27-01-2014


चित्रांकन-अमित कल्ला,जयपुर 
जब भी मैं अतीतबोध वाले मोड में जाता हूँ तो मुझे बहुतेरे संस्मरण खींच लेते हैं.साल और तारीख का अंदाजा जाता रहा.तब हम फुर्तीले तो थे मगर व्यवस्थित नहीं.एक बारगी चित्तौड़गढ़ में मास्टर शशांक चित्तौड़ में अपनी एक प्रस्तुति को लेकर आने वाली थे.(अब तो उन्हें मास्टर शशांक कैसे कह सकते हैं.)जी ये वही हैं जो युवा और प्रखर बांसुरी वादक के रूप में आज विश्व विख्यात हैं.ये दक्षिण भारतीय स्टाइल में बासुरी बजाते हैं.इधर हम एक तो आयोजन के स्थान को लेकर पहले ही तंग हालत में थे,निसंदेह बेनर स्पिक मैके का था,ले दे कर मेवाड़ गर्ल्स कॉलेज ने हामी भर दी.हम सभी अचरज में थे.उसी वक़्त पता चला राजस्थान की तत्कालीन राज्यपाल श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल भी अपनी इच्छा से उसी आयोजन में बांसुरी सुनने आना चाहती है.हमारी परेशानी एकदम बढ़ गयी.तमाम तामझाम व्यवस्थित करना हमारे लिए एकदम नए और विलग अनुभव संसार में प्रवेश करना था.


हम जिसे परेशानी समझ बैठे उसे प्रायोजक शिक्षण संस्था एक अवसर.उस दौर में एक आयोजन के पाँच हजार मिलते थे मेवाड़ गर्ल्स कॉलेज ने हमें कोई बीस हजार दे दिए. तमाम तरह के प्रोटोकोल से गुज़रते हुए हमने पहली बार पुलिस सुरक्षा में बांसुरी वादन सुना.किसी राज्यपाल महोदया के बगल में बैठ कर और मंच संचालन करके आयोजन में शिरकत का यह पहला ही मौक़ा था.उस दिन के लिए हम भी वीआईपी टाइप के हो गए थे.सूचनाएं हमीं से होकर जा रही थी.बाद में पता चला राज्यपाल साहिबा के साथ की लीं गयीं हमारी तस्वीरें तो कहीं खो गयी मगर प्रतिभा जी के राष्टपति बनते ही उसी आयोजन के फोटो मेवाड़ कॉलेज के ब्रोसर पर सालों तक छपते रहे.आज जाकर लगता है हमारे कामकाज में बाज़ार की घुसपैठ की खबर कई बारी हमें भी बाद में लगती है (उसी रील को दोहराते हुए आज यूट्यूब की मेहरबानी से शशांक जी को सुन रहा हूँ.)

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