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10 नवंबर, 2013

10-01-2013


  1. झारखंडी जनगीत सुन रहा हूँ ,प्रादेशिक भाषाओं के संपर्क में आने पर उनकी चर्चा कर कहना चाहता हूँ कि जिन शब्दों का अर्थ लगाने में बड़ी दिक्कत होती है उन्हें ही जनगीत/लोकगीत की तरह लय रूप में सुनने का आनन्द बिलकुल विलग है.मुझे शास्त्रीय संगीत कई बार इसलिए भी अच्छा लगता है कि शाब्दिक अर्थ और उनके शास्त्रीय होने की नियमावली से मैं सर्वथा अनभिज्ञ हूँ
  2. पहली फुरसत में सुनने योग्य कुछ ज़रूरी ऑडियो जिन्होंने दिल और दिमाग को आकर्षित किया . चंद्रिका मीडिया के साथियों ने बड़ा गज़ब काम किया है उनके ब्लॉग 'दख़ल की दुनिया ' पर भी उन्हें केच किया सकता है http://dakhalkiduniya.blogspot.com/
  3. जीवन में बहुत से मिले,कइयों को रास्ते में छोड़ दिया,कइयों को आज भी साथ में चिपकाए हुए हूँ.चित्तौड़ में रहते हुए अपने आसपास के हिंदी सेवी मित्रों (इसमें वे सभी शामिल हैं जिनसे मैंने हिंदी पढ़ने/रचने/और उस पर चर्चा करके किसी निष्कर्ष की तरफ बढ़ने के संस्कार सीखे हैं )के अलावा इस फेसबुक में मुझे कई बड़भाइयों/एक-दो बहिनों का साथ मिला है.उन सभी से ख़ासा प्रभावित होने के साथ उन्हें विचार के स्तर पर फॉलो भी करता हूँ.कइयों से तो आज तक मिला नहीं, एक दो को छोड़कर बात भी नहीं की गोया अशोक कुमार पाण्डेय,प्रभात रंजन,प्राञ्जलधर,अनुज लुगुन,अनिता भारती,कुँअर रविन्द्र,नील कमल,मनीषा कुलश्रेष्ठ,रमेश उपाध्याय जी,अरुण देव,हिमांशु पंड्या,आशुतोष कुमार,रवि कुमार,विमलेश त्रिपाठी,अविनाश दादा,रवीश कुमार और पुरुषोत्तम अग्रवाल जी सहित दुर्गा प्रसाद जी अग्रवाल और माधव हाड़ा जी.बहुत सारे नाम है.उनकी हर बड़ी खुशी में खुद को शामिल समझता हूँ.
  4. तीन परिचितों के घर हो आए रेणु दीदी,राजेश चौधरी जी और लक्ष्मण जी व्यास।तीनों के तीनों मृदुभाषी और भावुक किसिम के आत्मीयता की हद तक जाते साथी।भरपूर बातें और प्लेटों में सजा नास्ता,डायबिटिक आदमी से लेकर नॉन-डायबिटिक सबके हित कुछ ना कुछ ज़रूर है मीनू में.।मेरे और नंदिनी को अटेंड करने के साथ ही तीनों ने अनुष्का को भी पूरा अटेंशन दिया।बच्चों को अटेंशन देना अपने आप में एक टेंशंभरा काम है.मुझ जैसा इस काम (बच्चे को बातों में उलझाने के) में असफल आदमी साबित हुआ मगर लक्ष्मण जी तो गज़ब.कम उमर के इन नन्हें-मुन्नों से बतियाना कोई उनसे सीखें। किताबों से लेकर गिरस्ती की बातें।घर की खींचातानी से लेकर बाहर की रसभरी बातें।चर्चाओं के सारे हिस्से बिदुओं तक कबड्डी देते हुए शाम की सात के निकले साढ़े नौ तक ठिकाने पहुँचे।मिलते रहने से मीठास बनी रहती है.इस स्टेट्स् में ही कई सारी नयी थीम है चाहो तो समझ लो.वक़्त के साथ आये बदलाव में हम बच्चों के स्तर तक जाकर कितना समय उनके साथ व्यतीत करते हैं यह फिर से सोचने वाली बात है.मिलने-जुलने की परम्पराओं के बीच आपसी स्वार्थ की गणित किस कदर हमसे आ चिपकी है यह भी चिंतन का पॉइंट है.आख़िरी पॉइंट जो फिलहाल मुझे दिख पद रहा है कि हम अपनों के बीच कितना खुलकर और कितना एक विशिष कूटनीति के साथ छिपाव करते हुए बतियाते हैं सोचने की बात है
  5. कुछ तुम जोर लगाओ उधर से
    कुछ हम लगाएं इधर से
    क्या पता इससे ही देश बच जाए
  6. राष्ट्र सेवा का मौक़ा 'नयों' को भी मिलना चाहिए एक ही टाईप के लोग ही देश सेवा कर सकते हैं यह बड़ा विचित्र नियम है,फिर तो दूजे सक्रीय कार्यकर्ता कभी भी देश सेवा कर ही नहीं सकेंगे।(दुःखद)
  7. 'परिवारवाद' का हष्टपुष्ट होना हमारे चयन में गड़बड़ी का प्रबल संकेत हैं
  8. गांवों में आत्मीयता बची है मगर इतनी ही बची है जितनी बेसन की चक्की वाली थाली में से सारी चक्कियां काट लेने के बाद खुरचन बचती है
  9. दो दिन की दिवाली अपने गांव अरनोदा में माँ-पिताजी के साथ मनाके लौट आया,लग रहा है पूरी तरह नहीं लौट पाया।
  10. मेरी तरह पढ़ने के आलसी मगर कहानियों के लगभग शौक़ीन मित्रों के लिए युनूस भाई चुपके-चुपके बड़ा काम कर रहे हैं यहाँ सुनिएगा उनका ताज़ा काम http://katha-paath.blogspot.in/2013/11/kumarambuj.html
  11. त्योंहारी सीजन में घर में धन-दौलत आयी कि नहीं,अभी तक तो पता नहीं चल पाया मगर कुछ बातें आ गयी है यह साफ़ हो गया है गोया नाक में भयंकर वाली सर्दी आ बैठी है,गले को खरांस और खाँसी ने पकड़ लिया है.हिंदी एमए अंतिम वर्ष कोटा ओपन एक्जाम का टाइम टेबल आ गया है.तेईस दिसंबर से लेकर तीन जनवरी तक परीक्षा देना तय हो गया है.पांच पेपर की सात किताबों को रटते हुए ठीक से पास होने का दबाव आसपास आ बैठा है.गप मारने के हित फुरसत में अब लगने वाली आचार संहिता ठीक सामने दिख रही है.स्मूदली चलते-चलते अचानक पथरीला रास्ता आ गया लगता है.होसला/नाक/गला/परीक्षा परिणाम/बैठकें कायम रहे.
  12. दीपावली पर दीयों का अर्थ मेरे मतानुसार खुद के भीतर का दीया जलाने से है,वो भी एक नहीं बहुत सारे दीये ताकि उजाले से अपनी नियत में व्याप्त खोट को ठीक से पहचान सके.नियत जस की तस ही बनाके रखने की ठान रख्खी है तो तेल बाळने से क्या मतलब ? मेरे लिए दीपावली का दूसरा अर्थ नॉस्टेल्जिक होने की हद तक जाने के लिए अपने गांव जाना और माँ-पिताजी के साथ रहना है.किसी कारणवश अगर हम गांव नहीं जा पाते हैं तो उधर पिताजी को पड़ौसियों और इधर अपने दिल से उपजे ओळमो से खुद को तेज वाला सामना करना पड़ता है.
  13. इन उत्सवी दिनों के बीच आज हमारी शादी को सात साल पूरे हो गए(यानिकि लड़ते-झगड़ते/मनाते-रूठते/गिरते-पड़ते/दौड़ते-रुकते/ठाहकों-धमकियों/दर्दों-दिलासों/परेशानियों-हौसलों/मनमुटावों-गर्जनाओं से भरे कितने दिन गुज़र गए और इस तरह यह रिश्ता ओर भी प्रगाढ़ होता गया.नंदिनी को मुझ जैसे कमतर इंसान के साथ इतने साल बिताने के लिए सार्वजनिक रूप से शुक्रिया।)
  14. यूट्यूब पर शमशाद बेगम के सदाबहार गीत सुन रहा हैं और जोड़े से बेसन की चक्की बना रहे हैं,चक्की सकुशल बन जाए मतलब सालभर के गुनाह मुआफ (सनद रहे कि चक्की बनाने में बेसन के रोट को बारीक मसलने का काम गिरस्ती में मेरा एकमात्र वार्षिक योगदान है)
  15. नितांत जातिवादी/धार्मिक रूप से दकियानूसी/अगंभीर/अपने बजाय अभिनेता-अभिनेत्रियों के चित्र चस्पा करती प्रोफाइलों वाली महान आत्माएं/ जिनके पास साझा करने को फ़ोटो ज्यादा विचार कम है / पूजा-पाठ में रुचिशील/तंतर-मंतर से देश बदलने वाली मानसिकता के धनी लोग मेरी मित्रता सूची में ना भी रहे तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
  16. राजेन्द्र यादव जी के 'लेखकीय' जीवन को सलाम जिनके नाम में 'स्वर्गीय' लिखना अच्छा नहीं लग रहा है
  17. सोचता हूँ,कुछ महीनों के लिए अंतरध्यान हो जाऊं (अफ़सोस सिर्फ सोचता ही हूँ )
  18. महेंद्र खेरारू से उधारी में लिए इस चित्र के ज़रिए आज यही कहना है कि सफ़र लंबा तो है मगर लम्बे होने का अहसास भी कायम है,यह भी सच है कि मंझिलें ठीक से बन नहीं पा रही है.मगर उत्साह कायम है.दिल साफ़ है,दिमाग दुरुस्त है,ईमान मजबूत है 
  19. दिसंबर,2013 में (हिन्दी एम्ए फाइनल) की परीक्षाएं,दिसंबर एंड में नेट-2013 की फिर परीक्षा,शायद जनवरी,2014 में हिन्दी फर्स्ट ग्रेड परीक्षा,इन दिनों की कोचिंग की पढ़ाई इन्हीं सभी हालातों के बीच नौकरी और गिरस्ती।खुशखबर यह कि कई तरह के दबाओं के बीच भी उम्मीदें कायम है

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