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30 अप्रैल, 2015

30-04-2015

सुबह 'पहल' के सम्पादक और वरिष्ठ कथाकार ज्ञानरंजन जी से बात हो रही थी.ज्ञानरंजन जी मेरा परिचय उनकी लिखी 'पिता', 'अमरूद का पेड़', 'फेंस के इधर और उधर' जैसी कथाओं से है.उनके कथा संसार का फेन मैं भी हो गया.ऐसा हुआ कि इन्हीं कहानियों का मित्रों में घर/चित्तौड़ किले में कई पाठ कर चुका हूँ.मैंने बहुत सारा साहित्य चित्तौड़ दुर्ग की वीरान जगहों पर ही पढ़ा है और पढ़ ही रहा हूँ.हाल के में छपी रचनाओं पर बातें हुयी.अंक की बेहतरी और कमजोर बाइंडिंग पर चर्चा हुयी.अंक में शामिल लेखकों के नाम/पते/संपर्क नहीं छापने पर हुयी पाठकीय असुविधा से भी उन्हें शिकायत दर्ज करवाई.बड़ी सहजता और इत्मीनान से बात की.सम्पादकीय में उनके लिखे पर मैंने आश्चर्य व्यक्त किया तो बोले यही सच है कि हम अब 'पहल' के और सदस्य नहीं बना पायेंगे,बाकी लोग पत्रिका का ई-संस्करण ही पढ़े.सुनने में अजीब सा लगा मगर बाद में पता चला पत्रिका का लागत मूल्य भी हम पाठक उन्हें नहीं दे पा रहे हैं. कैसा समय है.

आज देश की सबसे प्रतिबद्ध पत्रिकाओं में 'पहल' का नाम है.ज्ञानरंजन जी के संघर्ष और प्रतिबद्धताओं से सभी परिचित हैं.मैंने मूल्य बढ़ाने की बात कही तो आगे कहने लगे भाई हम एक हजार प्रतियों का ही घाटा सह पायेंगे.इससे आगे हमारी हिम्मत नहीं. लागत ही सत्तर-अस्सी पर जा ठहरती है.जबकि मूल्य है पचास.अब बढ़ाएंगे तो बुरा लगेगा क्योंकि वैसे ही यह पत्रिका वगैरह ज्यादातर मध्यमवर्गीय,विद्यार्थी और आर्थिक दृष्टि से कमजोर मगर साहित्यिक रूचि के चलते ज़रूरतमंद साथी ही पढ़ते हैं.हमें उनका भी ख़याल रखना होगा.बात सुन मेरे रोंगटे खड़े हो गए.बातचीत ख़त्म होते होते बोले अगला अंक विशेष होगा.सौवां है ना.आगामी अंक को लेकर उनमें बड़ा उत्साह अनुभव हुआ. कह रहे थे तीन सौ पेज का होगा. जुलाई के पहले सप्ताह तक आ पाएगा.

मैं जब भी पढ़ाई करने बैठता हूँ तो शुरुआत किसी भी हाल की आयी हुई और पढ़ने से बची हुयी पत्रिका से करता हूँ. फिर मन रमने लगता है तो अपने सिलेबस की किताबों से जा टकराता हूँ.'पहल' का निन्यानवें वाला अंक अभी तक बड़ा ज्ञानवर्धक साबित हुई है.जीतेन्द्र रघुवंशी जी पर विजय शर्मा जी का संस्मरण छू गया.एकदम आत्मिक और गंभीर.मंटो पर राजकुमार केसवानी जी का चयन अमूमन पत्रिकाओं से विलग अनुभव हुआ.रणेंद्र भाई के दोनों चर्चित उपन्यासों पर फिर पढ़ा मगर इस बार प्रणय कृष्ण जी जैसे बहुत कम लिखने वालों को पढ़ने के लिए कुछ तेज़ दिमाग की ज़रूरत महसूस हुयी.बहुत बारीक समीक्षा है.भीतर तक के देशव्यापी गरम मुद्दों पर पैनी नज़र.सबसे अच्छी समीक्षा नरेश सक्सेना जी के कविता संग्रह 'सुनों चारुशीला' कीलगी.पहले भी संग्रह पर औरों का लिखा पढ़ा मगर इस बार की डोज बड़ी गाम्भीर्य लिए हुए लगी.हैदराबाद विश्विवद्यालय के प्राध्यापक गजेन्द्र पाठक जी समकालीन और कवियों से तुलना करते हुए बड़ा अद्भुत विश्लेषण किया है.पहले भी सोचकर ही रह गया मगर इस बारी पक्का सोच रहा हूँ संग्रह खरीद कर पढू.उदयभानु जी के ज़रिये उत्तरपूर्व की टोह लेती कहानी 'अंगरक्षक' अच्छी लगी.मुझमें उदयभानु जी का लिखा और भी पढ़ने को उत्साह जागा है.बाकी रचनाओं पर पढने के बाद.बहरहाल ज्ञानरंजन जी को चयन और सम्पादन की बधाई.सौवें अंक का इंतज़ार और बढ़ गया है.
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'विश्व नृत्य दिवस' पर केवल शास्त्रीय नृत्य के कलाविदों को ही क्यों तमाम लोक नर्तकों और लोक कला के जानकारों को भी शुभकामनाएं और बधाई.मैंने जितना ओडिसी,भरतनाट्यम देखा है उतना ही मयुरभंज छाऊ और गैर नृत्य देखा है.जितना कथक और मणिपुरी समझा है उतना ही घूमर और घरबा भी.जितना कुचिपुड़ी से प्रभावित हुआ उतना ही गोटिपुआ से भी.खुद को मैं जितना कथकली के प्रति झुका हुआ पाता हूँ उतना ही खुल को नार्थ ईस्ट के बम्बू डांस पर फ़िदा होते अनुभव किया है.बिहू,सिद्धि गोमा,छत्तीसगढ़ी नाचा हमेशा जेहन में रहते हैं.बीते तेरह सालों में सौ से भी ज्यादा कलाकारों के साथ संगतें की है.कई आयोजन,कई जाजमें,कई संचालन,कई इंटरव्यू.कइयों का प्रभाव मुझ में है.कई किस्से हैं जो मुझे इन जानेमाने नर्तकों और नृत्यांगनाओं ने दिए हैं.शास्त्रीय और लोक दोनों के अपने-अपने मायने हैं.दोनों को अलग-अलग और बराबारी के साथ देखा जाना चाहिए.एक दूजे की कोस्ट पर हम उनकी तुलना नहीं करें तो बेहतर होगा.शास्त्रीय का अपना नियम-क़ानून हो सकता है तो लोक के अपनी खुशबू.जब भी शास्त्रीय नृत्य सत्रीय याद आता तो लोक की चर्चा चलते ही कालबेलिया,भवाई,तेरहताली और चरी नृत्य भी सायास ही याद हो आते हैं.मतलब यह हुआ कि यह विश्व नृत्य दिवस भारतीय सन्दर्भों में मेरे अनुसार जितना कथक नृत्यांगना शास्वती सेन और मोहिनीअट्टम की डॉ. दीप्ती ओमचेरी भल्ला का है उतना ही कालबेलिया की गुलाबो का भी है.
कितने-कितने बड़े नाम है जिन्हें बहुत करीब से जाना और देखा.ओडिसी के केलूचरण महापात्र और गुरु गंगाधर प्रधान से लेकर सोनल मानसिंह से होते हुए कविता द्विवेदी और आरुशी मुद्गल जैसी नवोदित और मेहनती कलाकारों तक की यात्रा की है.सफर बड़ा लंबा रहा.कथक का ज़िक्र करें तो हमने सितारा देवी जी से होते हुए बिरजू महाराज से कथक के दर्शन किए हैं.प्रेरणा श्रीमाली जी,राजेंद्र गंगानी जी,मालोबिका मित्र जी,उमा शर्मा जी सरीखे कई बड़े नाम है जो आज कथक की विरासत में याद आ रहे हैं.हर एक नृत्य की अपनी लम्बी परम्परा और कई-कई घरानों की खुशबू है इस मुल्क में.भरतनाट्यम की बात छिड़ते ही मल्लिका साराभाई,गीता चंद्रन,मालविका सर्रुकाई,रमा वैद्यनाथन जी,रंजना गौहर जी से लेकर दक्षिणा वैद्यनाथन तक चर्चा होती है.बाकी हवाले फिर कभी.बहरहाल हमारे शास्त्रों और हमारे लोक को नृत्यों के बहाने हम तक पहुँचाने के लिए तमाम कलाकारों/जानकारों का शुक्रिया.
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जो रचनाकार/पाठक/श्रोता/दर्शक अपने जीवनभर सिर्फ और सिर्फ संख्या में खेलते/देखते/सुनते/पढ़ते और लिखते हैं मुझे उन पर बड़ी दया आती है.यथासंभव सृजन/रचन/मनन/पठन जैसी क्रियाओं को संख्यात्मक कलाबाजी और आंकड़ों से दूर रखो तो ही अच्छा.कुछ लोग सिर्फ इसलिए जी रहे हैं वे किताबें लिखने का शतक लगाकर मरना चाहते हैं.कुछ लोग आयोजनों की गहराई में जाए बगैर तथात्मक प्रगति में ही इतना उलझे हैं कि असल मंतव्य चुक गए लगते हैं.बड़ी दया आती है.हमारे गुरूजी सत्यनारायण जी व्यास ने कई बार कहा कि तथ्य कभी सच नहीं होते, हाँ सच के करीब हो सकते हैं.वैसे भी आंकड़े बदलते हैं.हमें सच को तलाशना चाहिए.तथ्यों के पिछे भागना ग़लत दिशा पकड़ लेना हो जाएगा.
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मेरे लिए 'कविता' का मानी हैं कि कविता वो है जो दिमाग खराब करती है.बेचैन बनाती है.रुलाती है.आगे ले जाती है.झकझोरती है.यथास्थितिवाद का विरोध करती है.अँधेरे में उजाला होती है.मौत को दुत्कारती हुई जीवन दिखाती है.विरोधाभाषी दुनिया के बीच लड़ने की ताकत देती है.कविता शब्दों की अठखेलियों से बहुत दूर का दर्शन है.'कविता शब्दों का सिर्फ जोड़-घटाव नहीं होती प्यारे...............अच्छा होता कुछ बड़े कवियों को पढ़ने के बाद कविता लिखते.................इतनी भी क्या जल्दी थी प्यारे......
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बिना काम किए अखबारी पन्ने में नाम छपवाने की इच्छा रखने वाले भुक्कड़ लोगों पर बड़ी दया आती है.असल पहचान आपका काम है न कि नामछपा वह पन्ना जिसकी किस्मत में किसी कचोरी-समोसे की पूडकी बन जाना भी लिखा है.कुछ ट्रिकबाज लोग समाज में काम-वाम कुछ नहीं करते बस सीधे 'सम्मानित' होते हैं.और तो और 'सम्मान' के समाचार से अखबार का एक कॉलम भी हड़प लेते हैं.
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अम्बेडकर जैसा आदमी जो हमेशा अपने विचारों से अवतारवाद के खिलाफ ही दिखा और रहा उसे ही अवतार में तब्दील करना ठीक नहीं है शायद.अम्बेडकर मतलब है सच को सच कहना.अम्बेडकर का अर्थ है जमकर अध्ययन करना.अम्बेडकर का मायना है अपनी सही बात पर अडिग रहना.अम्बेडकर का जीवन कहता है आगे बढ़ो औरों की तरह कट्टर और दकियानूसी मत बनो.अपना विकास चाहते हो तो जातिवाद में मत उलझो.अम्बेडकर के जीवन से सही प्रेरणा यही हो सकती है कि हम अपना विकास और प्रगति चाहते हुए कम से कम प्रतिशोध पालते हुए 'शोषक' की भूमिका में न आ जाएं.अब की ज़रूरत और प्रासंगिकता 'वर्ग' की सामूहिकता में है बिखराव में नहीं.अच्छे उद्देश्यों के लिए एकजुटता ज्यादा ज़रूरी है.अम्बेडकर की बदौलत हमारा परिवेश एक समतामूलक समाज की तरफ काफी आगे बढ़ा है.वंचित वर्ग के आगे बढ़ने की चर्चा में महाराष्ट्रीय सामाज का जागरूक चेहरा ज्यादा आकर्षित करता है जो खुद को रूढ़ियों से आज़ाद करता हुआ आगे बढ़ने की बात करता रहा है.
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हालांकि मेरा चयन नहीं हुआ है मगर मेरे लिए आज बड़ी खुशी कि बात है कि मेरे दो जिगरी दोस्तों का चयन आरपीएससी राजस्थान की फर्स्ट ग्रेड स्कूल व्याख्याता भर्ती में हो गया है.वे पहले से ही सरकारी नौकरी में थे मगर उनकी मेहनत और आशा अब जाकर पूरी हुई. हिंदी विषय के साथ प्रवीण कुमार जोशी(09829250561) और इतिहास विषय के साथ जितेन्द्र कुमार सुथार(9460306511).दोनों मेरे टीचरशिप डिप्लोमा के साथी हैं.और भी मित्रों के चयन की खबरें हैं मगर फिलहाल दोनों को बधाई.दोनों की तनख्वाहें बढ़ जाएगी.वक़्त-बेवक्त काम आयेंगे.मैं खुद इस परीक्षा में हमेशा की तरह फेल हो गया.असल में मुझे पास होने से ज्यादा फेल होने के अनुभव ज्यादा है.
हाल के बीते के एक आयोजन में हमारे गुरूजी डॉ. सत्यनारायण जी व्यास कह रहे थे 'जीवन में सफलता और सार्थकता दोनों अलग-अलग संप्रत्यय है.ज़रूरी नहीं कि जो सफल हो वो सार्थक जीवन भी जी रहा हो.' खैर मुझे अपनी दिशा और दशा को लेकर कोई भी पछतावा नहीं है.लगे हुए हैं कभी तो मंजिल आयेगी.'हिंदी' जैसा विषय मैंने बीते तीन सालों से शौकियाना और अकादमिक तौर पर पढ़ना शुरू किया है अभी वक़्त लगेगा.बहुत पढ़ना बाक़ी है.मंजिल को लेकर मैं इतना उतावला नहीं हूँ.फिर दिशा देने वाले दोस्त हैं ही.
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