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15 नवंबर, 2010
किले में कविता :-'जब ठिठुरा किला पूरी रात

किले में कविता :-'जब ठिठुरा किला पूरी रात

  न पूछा किसी ने बिछोने का   न ओढ़ाने की सोची किसी ने आज जब ठिठुरा किला पूरा शहर में रातभर पिछले दिनों की मावठ का अस...

03 नवंबर, 2010
किले में कविता:'मैं अवेरता हूँ पत्थर'

किले में कविता:'मैं अवेरता हूँ पत्थर'

खस्ताहाल महल देख तुम  चकित न होना पलभर  सारी यादें ताज़ा करते   यहीं ठिकाने भामाशाह के आँख फाड़ फाड़ क्या हो देखते जो बिखरा है वही सचाई न...

31 अक्टूबर, 2010
किले में कविता:'कौन खबर ले किले की'

किले में कविता:'कौन खबर ले किले की'

अतिथि को दिखाने के काम आता था किला हमारे शहर का विचार नकली था मगर बरसों बना रहा अटल पुरखों से हमारे घर में कभी कभार बन ...

 
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