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14 जनवरी, 2012

इसी शहर के आँगन में

उम्र गुज़ारी यहीं बरसों
जहां लिखा भी,पढ़ा भी
लगातार बिना रुके-थके
इसी शहर के आँगन में

फितूर पालकर कई सारे
गड़ा भी और खपा भी
नतीजतन हुआ क्या
झुका भी और उड़ा भी
इसी शहर के आँगन में

बना भी,बिगड़ा भी
फला भी फूला भी
और फिर लड़ा भी
इसी शहर के आँगन में

मैं गाँवड़ेल था शुरू में
वक्त तो लगना ही था
धीरे धीरे जम ही गया
इसी शहर के आँगन में

ये बीच की लकीरें
आँख में खटकती रही
इन्हें यथासमय मैंने
तोड़ा भी,मरोड़ा भी
इसी शहर के आँगन में

दोगलों को निरखा सालों तक
और हमदर्द को परखा भी
यूं व्यवहारखाते मिटते हुए
पसरा भी और सिमटा भी
इसी शहर के आँगन में

नदी,रास्ते और इमारतें
बहुत लिखी बस्तियां यहाँ
ढलती कविताओं के दौर में
निखरा भी और लुड़का  भी
इसी शहर के आँगन में

खूब रटा गाँव यहाँ
गोष्ठी और आकाश में
खूब कहा इतिहास किले को
यूं घूमा भी और भटका भी
इसी शहर के आँगन में

छपा भी और अटका भी
कई दौर,रास्ते गुज़र गए
ठिठका भी,चटका भी
मगर रहा सफ़र जारी
इसी शहर के आँगन में

सीख ली समय रहते मैंने
नई गिनती,नए आखर
ज़माने की जोड़बाकी आखिर
यूं रंगा भी और उतरा भी
इसी शहर के आँगन में 

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