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17 मई, 2012

17-05-2012

कई विचार एक साथ:डायरी लिखूं,कविता लिखूं,किले में जाऊं,किताब पढूं,मित्रों से घप्प लड़ाऊँ,बेटी के साथ वक़्त बिताऊँ,बगीचे में जा आऊं,गीत सुनूं,अतीत के अनुभव रिकोर्ड करूँ,इन सभी के विरुद्ध या कि  फिर गृहस्थी चलाऊँ.पहले से तय काम की तरह स्कूल की छुट्टियां शुरू।गाँव से पिताजी बुला रहे हैं।ससुराल वाले पत्नी के पीहर बुलाने को मेहनत कर रहे हैं।बहिन के घर जाना है।दोस्त के शहर भी जाना सूचि का हिस्सा है।कुछ छांटी हुयी किताबें मेरे द्वारा पढ़े जाने की बारी में हैं।फुरसत के लम्बे दिन सामने हैं।मेरी छोटी छोटी तमाम इच्छाएं भी यहीं मरा मूंह देख  रही है,पूरा होने को। ट्रेन के टिकट डायरी में पड़े हुए अपने काम आने के इंतज़ार में हैं।कई  शहर मेरी झलक पाने के लिए बेताब हैं।एक मैं ही ठाले की तरह तय नहीं कर पा रहा हूँ।ये अनिश्चय की स्थिति मरे दोस्तों को भी मुबारक हो।ताकि सब बराबर रहे।

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