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12 जून, 2012

12-06-2012

दिनों के बाद मिले मित्र के साथ बातों के गप्प लड़ाने में जो आनंद है वैसा मजा भला और कहाँ ?.कल शाम मेरे अनुज और अब तो लगभग पूरे दोस्त नितिन के साथ हाल की कर्नाटक यात्रा के अनुभव साझा किये।बहुत सी अन्तरंग बातें भी हुयी .यात्रा के फोटो देखते हुई ही हमने दिमाग में क्लिक करते हुए यादों के झरोखों से भी कुछ मुद्दे निकाल कर उन्हें छेड़ा।घर जाने की आखिरी समय सीमा के पार जाने के ठीक पास जाकर हमने आज सुबह ही किले जाने के मानस  के साथ मजमा ख़त्म किया।

आज सवेरे ही सात बजे के आसपास हम निकल पड़े किले में।किले के लिए मेरा ये फेरा भी बहुत दिनों बाद था।ऊपर से ऐसे दोस्त के साथ जो मेरे अपडेट और किले की कविताओं की रचना यात्रा से भली तरह वाफिफ था।हालांकि मैंने उसके साथ उसे कविता सुनाने जैसे प्रहार नहीं किये।बस्ती होते हुए रतन सिंह महल के बाहर ही एक चौंतरे पर हंसी ठठ्ठा किया .आदिवासियों से लेकर आज के शहरी जीवन पर बातें हुयी।हमारी दोस्ती की शुरुआत से लेकर आज के लम्बे रास्ते के लगभग सारे पड़ाव पार करते हुए बातें हुई ।एक हम विचार दोस्त से बतियाना कितना रोचक हो सकता है ये कोई  विचारवान ही समझ सकता है।

दोपहर में पके हुए आम की तरह के अवसर सा मित्र प्रवीण कुमार जोशी (जिसे हम प्यार से 'बामण ' कहते हैं।)मिला ।आकाशवाणी के लिए उसका एक इंटरव्यू होना था। इटरव्यू के बाद नितिन के घर घंटे भर की तिकड़मी भी आज के खाते में ही लिखी गयी। स्पिक मैके  आन्दोलन के बीते दिनों को हमने लगभग उदेडते हुए याद किया।एक दूजे की हंसी उड़ाने के एक भी मौके को न गँवाने की कोशिश में समय बीता।

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