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19 सितंबर, 2010

डायरी:-''कारोई यात्रा और महाराजा शिवदान सिंह''

शिवदान सिंह जी 
आज मुझे  चित्तौडगढ के हिंदी साहित्यकार और समालोचक डॉ.सत्य नारायण व्यास के साथ एक लघु यात्रा पर जाने का अवसर मिला है इस यात्रा में रामधारी सिंह दिनकर की रचनाओं पर शोधरत रेणु व्यास और पिछले दिनों पश्चिमी सांस्कृतिक केंद्र उदयपुर से छपी राजस्थानी लोकाचार गीत पुस्तक की लेखिका चन्द्रकान्ता भी हैं.हम चित्तौड़ के कारोई गाँव जा रहे हैं जहां महाराजा शिवदान सिंह  रहते हैं.वे अपने राजस्थानी दोहों,अपनी कलाकृतियों के लिए कम लोकप्रिय कलाविद हैं.आज उन्हें जानेंगे. वैसे भी ऐसे कम लोकप्रिय अच्छी लोगों को दुनिया जाने ये हमारा दायित्व भी है. क्योंकि कई बार हम देखते हैं कि कलाकार और साहित्यकार  खुद अपने को दिखाने और जताने का इतना प्रयास नहीं करते. वे स्वाभिमान के चलते चाहते हैं की कोई  खुद आए और मुझे जाने तो ठीक है. वरना मैं अपना काम कर रहा हूँ.जौहरी आयेगा तो खुद ही पहचान कर लेगा.ये भावना हर उस आदमी में होती  है जो सृजनधर्मी है.बाकी की दुनिया में लोग ऐसे भी देखें है जो फोटो खिंचवाओ संस्कृति की औलाद होते है.येन केन प्रकारेण छापो और छपवाओ के कल्चर वाले है.बड़ा गुसा भी आता है ऐसों पर और दया भी. गलतफहमी के शिकार तो वे होती ही है.ऊपर से अधजल घघरी झलकत जाए की कहावत को सार्थक करते नज़र आते हैं.

वैसे रविवार के दिन अपने पत्नी और बच्चों को छोड़ कर कहीं जाना भी कम झोखिम भरा नहीं है पहले तो उन्हें ये बताना भी बड़ा मुश्किल काम है कि वे इस तरह रविवार के दिन ,पूरा दिन एक साहित्यकार के नाम करने वाले हैं. जो आने वाले वक्त में किस मायने में फायदेमंद होगा.,पता नहीं ,उन्हें कैसे समझाएं.जिनके लिए  समाज और संस्कृति की बात राशन-पानी की चर्चा के बाद  बचे कुचे समय के विषय हैं.हाँ आप तो मेरा विचार समझ पा  ही रहे होंगे  कि जिन्दगी में कुछ काम ऐसे भी होते हैं जो फायदे के लिए नहीं किए जाते.जीवन की दौड़ में हम लोगों ने वैसे भी सारे के सारे काम फायदे और नुकसान की गणित को बीच में ला कर  करने की आदत डाल दी है.


गोष्ठी और संवाद जैसे अच्छे कामों के लिए भी घर से जी चुरा कर या झूठ बोल कर जाना पड़ता है ये कैसा समय है. हमें पहले तो कहा जाता है कि हरफनमौला बनो,जब बनने लगते है और ये साहित्य,संस्कृति और कलावादी दुनिया जैसे ही कुछ हद तक रास आने लगती है  फिर पीछे से टांग पकड़ाई होने लग जाती है कि कुछ खा कमा लो फिर ये काम करना.अरे भाई अगर सरकारी नौकरी है ,आमदनी से घर आराम से चल रहा है फिर और ज्यादा कमाने की ये मजबूरी क्यूं.और बड़ा आदमी बनने का दबाव कब तक? विचार ये भी आता है मन में कि आदमी के जीवन में उसकी रुचियों का भी कुछ  ठीक ठाक स्थान होता है. या नहीं ? या जीवन में रुचियाँ केवल बाल जीवन तक ही समेट  कर रखी जाती रही है.या कि फिर नौकरी  के साक्षात्कार में अंतिम बार पूछी जाती है रुचियाँ.

2 comments:

  1. यात्रा के बारे में तो जानकारी ठीक है पर शिवदान सिंह जी के बारे में जानकारी बहुत कम | उनके जीवन परिचय के बारे में ज्यादा लिखा होता तो उन्हें जानने का बढ़िया अवसर मिलता |

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  2. shivdan ke bare me bahut hee achchhee jankaree mili...ek achchhe prayas ke liye badhayi

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