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18 सितंबर, 2012

कुछ नई कवितायेँ-6

Photo by http://mukeshsharmamumbai.blogspot.in/
(1)
एक तरफ
अतीतबोध
गुदगुली चलाता है
जीवन में
वर्तमान का
वैभव
बाँधकर रखता है
भावों को
दूजी ओर

अतीत कि
जिसमें शामिल हैं
एक तरफ

छत तक जाती
दीवार के सहारे लगी
लकड़ी की सीढ़ी
और छत से मोहल्ले की ताकाझांकी
याद आती है

इस तरह

दूजी ओर
आज के खाते शामिल है
आँगन में  उड़ती तितली
गली में खेलते बच्चे
बरसाती पानी में
तैरती कागज़ की नाव
और
इस उहापोह के बीच
दिल में दबे रह गए बहुत से
अनकहे विचार

(2)
रास्ता भटक न जाए
ये बातें
जो हैं किसी
शिशु विचार की तरह
पल रही थी
अब तक मन में

मुश्किल से ज़बान तक आयी
मन की बातें
पहूंची नहीं है अब तक तो
अपने
इच्छित कानों तक

जहां तक याद पड़ता है
ठीक वक़्त पर तो निकली थी
सारी बातें एका करके
सवेरे की गाड़ी से
सहेलियों की तरह गीत गाती

जाने कहाँ
अटक गयी होगी
जंगल में बहते झरने
से बतियाने में
मशगुल हो गयी हो गयी होगी

या फिर
आदतवश
खो गयी हो गयी होगी
उबासियों भरी नींद में
कहीं उदंड हरियाली के बीच
टहनियों पर लगे फल गिनती हुयी

बातें
बस पहुँच जाए
वहाँ तक सकुशल
जहां के लिए निकली थी
इतना उमाव भरा मन लिए
संवरकर

(3)
दिन को
लगाकर सीने से
गुजरी है
पूरी एक रात
सर्द हवाओं भरी

सभी पहर जागते बीते
व्यस्त रहे
सपनों की बुनावट में
कुछ लोग

जहां शामिल हुए
दिन की डायरी से
उत्साह सहित
अनगिनत रंगीन धागे
फंदों और सलाइयों
के बीच अठखेली करते

पहाड़ से निकली नदी
नाले में लहराती घास
हरेकच पेड़
अधखिले फूल
टुकड़ों में छाये बादल

सबकुछ
गुस्सेल सूरज की गरमी
झरने से आती फुंहारें
और
दुपहरी नींद से उठ बैठी कोंपलें

रात भर
चलता रहा
अथक
वो दिन
दूर तक
अपनी हरीभरी दुनिया के साथ
सपने बुनता रहा

एक नया स्पर्श
और
पहचाने शब्दों की संगत
से
संबंधो की चादर
बुनी गयी उस रात


इस तरह
दिन का क़र्ज़
चढ़ता गया
रिश्तों के खाते में
ज़िक्र यूं
बढ़ता गया
दिन का 

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