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24 नवंबर, 2012

कुछ नयी कवितायेँ-12

Photo by http://mukeshsharmamumbai.blogspot.in/
(1)

असल में
किसी गृहस्थ को
एकांत चाहिए था
रोने के लिए
जी भरकर
शायद उसे मिला है
अरसे बाद
औचक निरीक्षण में
एक सु-अवसर
खुद से एका करने का

(2)
एक मकसद पूरा हो गया
खुशफहमी में डूबे लोग
चले गए चुपचाप
लगाकर आग

यहाँ हमारे घरों में
कई जोड़ी 
आँखें मिचला रही हैं 
धू-धू करता धूआँ है 
और 
ज़बान से निकलती है बस 
गालियाँ बेशुमार


(3)
बोखलाकर आखिर में
सभी को भेज दिया है
हफ्तेभर की छूट्टी पर

सूरज,चाँद सहित
तेज़ ठण्ड की लहरें
कुछ भी असरकारक नहीं अब

सब लापरवाह नौकरों की तरह
बेकाम साबित हुए
इस बार
सबको दिया है
कारण बताओ नोटिस हमने
दगेबाजी का

बे-असर नोटिस
लिए हाथों में
हमें चिढ़ाता है सूरज
ऑफिस के लठेत बाबू का-सा
मूंह मचकाता है

न चाँद इतना शीतल रहा अब
किये हुए वादों की तरह
न धीर-गंभीर रहा उसका भाव
पहले की तरह

न लहरें यथासमय उठती है अब
न सीप मोती उगलती है यहाँ
सभी कुछ
व्यर्थ की श्रेणी में जा मिला है

अब तो बस
एक हारी हुयी बाज़ी रख्खी है
हमारी उदास हथेली पर

कांपती हुयी लकीरों के बीच
ठिठक गयी है कहीं
सारी विजय घोषणाएं

*माणिक *

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