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22 नवंबर, 2012

आंगन आकाशवाणी का

Photo by http://mukeshsharmamumbai.blogspot.in/
आंगन में 

ठुकी हुई थी
आँगन बीच एक आरामकुर्सी
टांग पर टांग धरे बैठा एक सुस्त रविवार

आँखों में आकाश लटकता रहा
और एक पुरानी दीवार
किले का सारा बोझ धरे
पीठ झुकाए हंसती रही
उस दुपहरी
आँगन में

कांपता हुआ एक दरवाज़ा था
जो  खड़ा था छोटी फाटक का हाथ थामे
नि:शब्द ताक रहा था आवाजाही
साफ़ दिखता रहा
लठ्ठ लिए हाथों में
आठ घंटे से लगातार सचेत एक चौकीदार

बेचारी छ बाल्टियां थीं
जो सालभर से लटकी थीं कुंदों में
लाल रंग से पूती  हुयी वे
रेतभरा बदन लिए अखंड खड़ी थी
माथे पर लिख कर
आग आग आग
सेवा में तत्पर
अर्धांगिनियों की-सी

बैठकों के इंतज़ार में
गुलाबी सर्दी का-सा फर्श बिछा रहा आँगन में
जमी हुयी कुर्सियां
दूर से ही हाल पूछती
एक दूजे से कानाफूसी करतीं
जी-हजुरी में मुस्तैद कारिंदों सी

एक लाड प्यार में पली दीवार थी
जिस पर बोगोंविलिया इतराता दिखा
ज़रूरत के मुताबिक़ हिलती दिखी
डालियाँ और पत्तियाँ
उच्चारण के अभ्यास में मशगूल
नए-नवेले उदघोषकों की-सी डरी-डरी

आवभगत में
कुछ उतरे हुए रंग के गमले
रखे थे पंक्तिबद्ध
सिर पर उठाये अचरजभरे अंगरेजी पौधे

एक नज़र थी कि
दरवाजे तक जाकर
लौट आती दर्ज़नों बार
उसी तरह कुछ उदघोषणाएं थीं
जो बजती रही किये हुए वादों की तरह

एक अभियंता था
जो बटन मरोड़ता था
तय समय पर
आँगन में लयबद्ध चलता रेडियो
उसी का कमाल था

एक लाल मुँही पाइप
दिखने में भले बेसुध पड़ा था आंगन में
पहुँच में जिसके था
पानी का टेंक और कॉलोनी की टंकी
टेरेकोटा के कुछ पेनल चिपके थे
सीधे दीवार पर से ही लगातार आवाज़ देकर बुलाते
आतेजाते राही का मन बहलाते
गाँव में आयी नौटंकी की तरह

पहाड़ सी ऊँचाई है
आँगन लगे टावर में
जहां धूप और छांव
छपे हुए कलेंडर की तरह
चिपके है क्षितिज तक

एक रूठे हुए दोस्त की तरह
पीठ करके इधर
दूर गैराज में खड़ी थी
एक सफ़ेद कार
पास खड़े स्कूटर बाईक को बरगलाती हुयी
और दु:खड़े सुनाती हुयी
पीहर आयी लाडो की-सी
मूंह मचकाती हुयी
एक सफ़ेद कार

इसी दुपहरी
सबकुछ क़ानून के शब्दश पालन की-सी तरह
नीम बर्तन मांझता दिखा
दिन की चाय के
शीशम आँगन बुहारता रहा
तन्मयता से
यूकेलिप्टस पुताई करता दिखा इमारतों की

कुछ फूल
मालाएं बनाकर चलाते हैं
गुज़ारा अपना
इसी दुपहरी
सुस्ताता है
इमारत के खाली हिस्से में
कड़ब-चारे से लदा
एक लापरवाह पिछवाड़ा

दर्ज़नभर मर्करी बल्ब
ऊंघ रहे थे
अब भी
रात की ड्यूटी  से फारिग होकर
थकहार लेटे थे मानो
अपने अपने खम्भों पर
अलसाए घंटों की शक्लों में ढले हुए

और आखिर में दिखा
एक पीपल
मुखिया की तरह
ठसक लिए बैठा था कौने में
वहीं से धाक जमाने की असफल कोशिशों में फटकारता
आम, अमलतास और सिताफली को

*माणिक *

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