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08 जनवरी, 2014

08-01-2014


  • मैंने अपनी तरफ से मौलिक कुछ भी नहीं कहा.पढ़ा और सुना हुआ ही कहा है ,मौलिक कहने हैसियत अभी से कहाँ ?कवि सम्मेलनी कविता,कविता का वो बिगड़ैल स्वाद है जो कुछ गेलसप्पे लोगों ने दुर्भाग्यवश जनता की ज़बान पर चढ़ा दिया है (उनमें कुछ गहरी राजनैतिक और स्वस्थ हास्य-व्यंग्य की रचनाएं अलग समझी जाए )सार्थक कविता सुनने और पढ़ने के बाद आदमी वह नहीं रहता जो वो कविता पढ़ने के पहले तक था.
  • जीवन के इस धुँधलके में एक साफ़ तस्वीर दिल बहलाने की हिम्मत तो रखती ही है (प्रकाश खत्री जी के साथ एक दिन की संगत के बाद खुश रहना सीख रहा हूँ) ''खुश रहने के क्रेस कोर्स के लिए उनसे संपर्क किया जा सकता है-सूचनार्थ और जनहित में जारी''
  • कुमार अम्बुज जैसों की किताब से नक़ल करके लोग सूत्र सम्मान पा गए.नए साल के सात दिन निकलने के बाद दिमाग चला तो लगा कि साल २०१४ में हम भी साहित्यिक चोरी करके एकाध संग्रह-वंग्रह निकालने की सोचें ,सो सम्मान देने वाली संस्थाओं से अवार्ड के लेनदेन संबंधी नियमों की निविदाएं आमंत्रित हैं.चोरी का साहित्यिक छापने वाले साहसिक प्रकाशक भी तत्काल संपर्क करें.
  • हर रात आठ से दस के बीच की टीवी देखते याद आता है कि हम जिस दौर में जी रहे हैं उस दौर में कभी भी रवीश कुमार और अभिज्ञान प्रकाश के होते हुए भी क्या 'प्राइम टाइम' प्रोग्राम का एक भी एपिसोड साहित्यिक मसले पर नहीं बनेगा ? सोचा शायद बाज़ार में साहित्य-वाहित्य के मायने बदल गए हैं.फिर लगा प्रकाश में आने के लिए हमें बाजारू होना पड़ेगा. मगर फिर याद आया हम बाज़ारवाद के वोरोध में तो लिखना शुरू हुए थे. ये यथासमय ठीक से याद आना भी कितना ज़रूरी है
  • स्कूल में पोषाहार बनाने के मद्देनज़र राशन खरीदा जा चुका है,बर्तन भी लगभग हो चुके हैं,आँखों के सामने मीनू है,चुल्हा है चोका है,प्रतिकार की कोई स्थितियां नहीं है,आदेशों की पालना में व्यस्त हैं,बच्चे हैं,नहीं सोच पा रहे तो बच्चों की पढ़ाई, सिलेबस ,परीक्षाएं, पाठ, कॉपियाँ.सताईस बच्चों के लिए कितनी मुठ्ठी दाल गिरेगी बताना ज़रा.तेल, मिर्च, हल्दी,जीरा, अजवाइन, लहसून, प्याज, कालीमिर्च आदि गरम मसाला का तो मुझे अर्धांगिनी से मालुम हो गया.लकड़ी महँगी रहेगी मगर गैस भी कहाँ सुलभ है ? सारी बातें भूल भी जाएँ मगर चुल्हा फूंकने की भूंगली बार बार याद आ रही है (स्कूल में पोषाहार अभियान)
  • नए साल में अपनी कविताएं विभिन्न स्तरीय साहित्यिक पत्रिकाओं में छपने भेजने का निश्चय किया है. यह निश्चय कविताओं और संपादकों की कसौटी साबित होगा.

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