कभी तो कबूलें हकीक़त कभी तो फेंकें दूर झूंठ की चादर जी लें कुछ देर नाटकबाजी के विरह में सोच कुछ ऐसा ही मन में आज दी है बचपन को शक्ल ...
कभी तो कबूलें हकीक़त कभी तो फेंकें दूर झूंठ की चादर जी लें कुछ देर नाटकबाजी के विरह में सोच कुछ ऐसा ही मन में आज दी है बचपन को शक्ल ...