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21 अक्टूबर, 2010
कभी तो कबूलें हकीक़त

कभी तो कबूलें हकीक़त

गुरुवार, अक्टूबर 21, 2010

कभी तो कबूलें हकीक़त  कभी तो फेंकें दूर झूंठ की चादर जी लें कुछ देर  नाटकबाजी के विरह में  सोच कुछ ऐसा ही मन में  आज दी है बचपन को शक्ल  ...

16 अगस्त, 2010
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कविता-''बुनियादी अन्याय ''

बुनियादी अन्याय  ------------------------ जो उगाता है  भूखो  मरता है जो कमाता है वो गरीब है आज आराम कुर्सी  पर बैठे...

22 जून, 2010
कविता :फुरसत के पल मेड़ पर

कविता :फुरसत के पल मेड़ पर

शेयर  काम सभी  निबट के बैठा है किसान खेत की मेड़ बादल देखे कभी वो साहस नापे अपना  याद उसे है आज भी बीता साल वो खाली-खाली  मंडराया  महाजनी...

 
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