कभी तो कबूलें हकीक़त कभी तो फेंकें दूर झूंठ की चादर जी लें कुछ देर नाटकबाजी के विरह में सोच कुछ ऐसा ही मन में आज दी है बचपन को शक्ल ...
कभी तो कबूलें हकीक़त कभी तो फेंकें दूर झूंठ की चादर जी लें कुछ देर नाटकबाजी के विरह में सोच कुछ ऐसा ही मन में आज दी है बचपन को शक्ल ...
बुनियादी अन्याय ------------------------ जो उगाता है भूखो मरता है जो कमाता है वो गरीब है आज आराम कुर्सी पर बैठे...
शेयर काम सभी निबट के बैठा है किसान खेत की मेड़ बादल देखे कभी वो साहस नापे अपना याद उसे है आज भी बीता साल वो खाली-खाली मंडराया महाजनी...