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27 जनवरी, 2010

नया मिले सुर मेरा तुम्हारा : ठीक ठाक


मित्रों
नमस्कार,
कल एक टी.वी. शो में मिले सुर मेरा तुम्हारा का नया स्वरुप देखने और साथ ही उससे जुडी रचना के सफ़र को सूना. पंडित भीमसेन जी की आवाज़ के ज़रिये पूरा हिन्दुस्तान जो आक्रसित होता था वेसा प्रभाव अभी अमिताभ जी का नही हो सकता. भले ही अमिताभ जी ज्यादा लोग जानते हो मगर,हम जानते है कि  भीमसेन जी की बात और ही रहेगी.वेसे एक हिसाब से लगभग सत्तर लोगों को शामिल करते हुए ये नया वीडीयो भले ही ज्यादा  लोगो को आकर्षित कर जाए मगर हम ये भी जानते है कि पुराने लोगो और उनकी बातों ,गीतों और आवाज़ का प्रभाव थोड़ा सा गहरा होता है. वो तो कायाम रहेगा. सच भी यह है. डॉ. बालमुरली कृष्णन और हरी प्रसाद जी जैसा भाव कोई और कहाँ पैदा कर सकता है.नए वाले में उस्ताद अमज़द खान साहेब और पंडित शिव जी के साथ अमिताभ जी  को लेने से इसकी लाज बचा गयी. एक दो सीन में तो कुछ अभिनेत्रियों को थोड़े से ठीक लिबास में ला पाते तो अच्छा रहता ,आमिर खान्वाला पार्ट बहुत संजीदा था.

लेकिन  एक बात ये भी है कि नए की भी कुछ तो तारीफ़ तो  बनती है. इसके निर्माता ने जो राष्ट्र भक्ति के लिए इतनी मेहनत  की है लाजवाब है.नए देखते रहने के साथ साथ हमें पुरानेकी याद आने से कोई नहीं रोक पायेगा. भले ही मैं अमिताभा जी बहुत पसंद करता हूँ लेकिन भीमसेन जी का वो प्रयाश तो नतमस्तक होने को राज़ी कर देता है.एक बात और कि हिन्दुस्तान को भावात्मक रूप से एक करने का म्युज़िक  जितना प्रभाव रखता है कोई और नहीं कर सकता.ये बात फिर एक बार साबित हो गयी है.पूरे देश के ख़ास ख़ास लीडर को शामिल करने का ये काम कुछ मायने में ठीक रहा.

बाकी अपनी अपनी राय है. हो सकता है कि आपकी राय अलग हो,मगर इस गीत कि और इसके लगातार प्रसन की आज के दौर में ज्यादा ज़रूरत लगती है. मन को कुछ एक रूप में शांति कि कहानी कहता गीत पहले वाला भी और ये भी मन को भाया .जितना हो सके सुने .कई बार नए पर ज्यादा बड़ी प्रतिक्रया करने के पहले बार सुने देखें.फिर कोई बात कहें तो  ठीक रहेगा.

आपका
 माणिक

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