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26 फ़रवरी, 2010

अपनी कहानी-2


          1995 में गांव (अरनोदा)छोडने के बाद से बीते 15 बरसों में जीवन का सफ़र लगभग एक सा ही रहा.. और साल दर साल सुविधाजनक ही बनता दिखा.दुनियादारी के लिये कुछ हद तक ज़रुरी जैसे पानी में तैरना और मोटरसाईकल चलाना तो अभी तक भी मैं नहीं सीख पाया हूं.मगर हां इस नये ज़माने की बारहखड़ी फ़िर से सीखने की तरफ़ ज्यादा ध्यान लगा रखा है.पिताजी के आसरे आसरे मास्टर बनाने वाले डिप्लोमा की पढा़ई  के बाद सारा काम अपने बूते ही आगे की यात्रा तय करने का मन बनाये रखे हुये हूं.इसमें सफ़ल भी हुवा.

किसी खास प्रणाली के ज़रिये कम्प्युटर नही सीख कर भी ज़रुरी टक टक कर लेता हूं.ये सब कुछ मेरी हर नये कलेवर की तरफ़ बढ़ने की आदत की वज़ह से हो सका है. चाहे साहित्य जगत से जोड़ने वाले युवा पल्लव भैया के पाठक मंच की बात करें या स्पिक मैके की,बस यही फ़ेक्टर काम आया.कभी नासमज़ी में बहुत सी कवितायें लिख डालने वाला मैं,एक नये सिरे से सोचता हूं तो उस नासमज़ी और कच्चेपन को साफ़ साफ़ पाता हूं.

गांव से आकर शहर में रहने के बीते 15 सालों के सफ़र में कई लोग मिले मगर कुछ ने ही मुझ पर असर डाला.बडे़ अधिकारियों से दुरी रखते हुये,बिना चापलुसी के अपनी योग्यता पर टिका रहा.खुद की तारीफ़ में एक लाईन भी कभी कहते ना बनी,मगर खुद की गाथा गाते शहर के ही बेशर्मों को लगातार सुनने की आदत है मुझे.अपनी कहानी के बनते बनते गहराई से जुड़ चुके लोगों में डा.सत्य नारायण व्यास,डा..एल.जैन,डा.पल्लव,डा.किरण सेठ,अशोक जैन को अपने आस पास पाता हूं.

लगातार...............


3 comments:

  1. बडे़ अधिकारियों से दुरी रखते हुये,बिना चापलुसी के अपनी योग्यता पर टिका रहा.खुद की तारीफ़ में एक लाईन भी कभी कहते ना बनी,मगर खुद की गाथा गाते शहर के ही बेशर्मों को लगातार सुनने की आदत है मुझे.-----bahut accha. aapne agnipath cuna hai. bahut aage badhenge.

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  2. जारी रहिये..आपकी कथा सुन रहे हैं..

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  3. रंग लाएगी किसानी।
    यह धरा होगी सुहानी।।
    और थोड़ी सी तपस्या।
    मित्र ! होगी हल समस्या।।.......

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