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26 सितंबर, 2011

ये कैसा समय है ?

ये समय पत्नी,बच्चों को
बगीचे में झुलाने का
घर,गाड़ी के सपने सजाने
और मात-पिता भुलाने का

तुम कितने भोले हो अब भी
भगत-सुभाष-गांधी में उलझे


वक़्त सेंसेक्स पर नज़रें गड़ाए
बैठकर,नोट छाप,ऐंठने का
कारनामें ढंकने,मुखौटेदार चेहरे सहित
होर्डिंग,बैनर्स पर बेहया लटकने का

कैसे समझाऊँ तुम्हें बाज़ार का गणित
शर्तिया न बिकेगी,न टिकेगी इस हौड़ में  
कला,विचार,नैतिकता,ईमान और सचाई 
बेकार चीजों सहित जो खड़े हो तुम दौड़ में

अब तो ठीक से अनुमान लो कि
ये वक़्त है दोगली चालें चलने का
और तो और अवसरों पर मुकरने का
शक्कर पछाड़ कर मीठा बोलते हुए
यूं चुपचाप बगल में छुरी धरने का

तुम अब भी होकम-हजूरी में
मेरे भाई जाने क्यों अटके हो
भावभरी बातों में डूबकर खोए 
यूं मुख्य सड़क से भटके हो


जबकि ये वक़्त  है
मारने-कूटने,छीनकर झपटने का
कूदने-लांघने,खुलकर अकड़ने का
तुम हो कि उलझे हुए बैठे हो यूं 
माँगने-टूंगने,सूखकर सिकुड़ने में

ये वक़्त चल रहा लूटने-खसोटने का
और दबे हुओं को नोचने-दबाने का
तुम्ही अकेले बह रहे हो धारा के विरुद्ध
वरना वक़्त है हवा संग बह जाने का

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