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28 जनवरी, 2012

28-01-12

सवेरे फेसबुक के स्क्रेब  देख और अखबार में छपे कागजी बासंती आलेखों के पन्ने पलटने के बाद सोच रहा हूँ. पूर्णिमा के वेतन की तरह हर माह मध्यमवर्गीय नौकरीशुदा परिवारों में तो बसंत आता है ,ये बात जग ज़ाहिर भी है,मगर क्या आप लोगों ने उन नीचले तबके के हित बसंत पकड़ लाने के लिए सपने संजोने का मानस बनाया है.इस बासंती हवा के अंदाज़ के साथ खेलने का मन तो आपका भी हुआ होगा.मगर ध्यान से देखना कोई तुम्हारे इस एकलखुरे बरताव को कुशल निशानेबाज़ की तरह सालों से बीन्दने  की फिराक में हैं.वो इस बारी अपनी खुशी हथियाने को पूरी तरह तत्पर है,कोई निशाना नहीं चूकने वाला है.अब भी सुधर जाओ.समय बाकी है,अपने आस-पास में याकि खुद के बरताव में बदलाव ले आओ.हो सकता है वो वंचित आदमी तुम पर रहम खा जाए.

जी करता है उन पिछड़े लोगों को उनके अवाम होने के अहसास के साथ ही उन्हें उनकी हनुमानी ताकत का अंदाजा दे आऊँ.जो अक्सर मुझे मिल जाते हैं कुम्भा नगर रेलवे फाटक के दोनों तरफ लगी लोहे की रेलिंग पर कांख में रोटियाँ दबाये या कि फिर हाथों में टिफिन लटकाए.फाटक क्रोसते हर आदमी में उस दिन के लिए मजुरी देने वाला व्यक्तित्व ढूँढती वे नज़रें कहाँ बसंत को पहचानती है.रो-बरोज़  चूल्हे की चिंता पालते वे आदमी उस तबके से ताल्लुक रखते है जिसमें सपने बहुत ज्यादा ऊँचाइयों वाले पनपते भी नहीं हैं.उन्हें उनके हिस्से का आकाश पता है.वे अपनी सीमाएं जानते हैं.अपने बंधनों से सुपरिचित हैं जो हमारे आसपास की ही बस्तियों के वाशिंदे हैं.ये अलग बात है कि हम उनके जुगाड़ से चलते जीवन से अनभिज्ञ है.

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