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28 जून, 2012

28-06-2012


मीडिया,पत्रकारिता और पत्रिकाओं के सम्पादन में हमेशा से ही कला सम्पादक और संस्कृतिकर्मी की बीट बहुत कम आंकी जाती रही है। अफसोस हम ऐसे दौर में पैदा हुए और सांस ले रहे हैं। असल में ये दौर हमारे  इन्ही मूल्यों के सही आंकलन और उनकेहकों के हित लड़ने का है।

''कला समीक्षक विनय उपध्याय के संपादकत्व में लगातार प्रकाशित और सराही जाने वाली कला पत्रिका 'कला समय' के बारे में हम सभी जानते हैं।एक ऐसे दौर में जब कला लेखन को लेकर बहुत सी नयी परिभाषाएं उभर रही हैं। ऐसी पत्रिकाएँ इस क्षेत्र की महत्ता को बहुत ढंग से सहेजे हुए प्रतीत होती है।खासकर भोपाल और नर्मदा के इलाके की गतिविधियों के साथ ही देश भर की सभी गहरी प्रवृतियों को प्रचारित -प्रसारित कर रही हैं।हम जैसे सुधी पाठक ऐसी पत्रिकाओं को पढ़ कर अपने वैचारिक आन्दोलन को भली तरीके से आगे बढ़ा सकते हैं।

हमारी नज़र में राजधानी के इर्द-गिर्द ही श्रेष्ठ हो सकता कि  भावना से बाहर निकल कर यदि हम कुछ प्रादेशिक हलके पर नज़र डाले तो बहुत से रत्न नज़र आयेंगे.ऐसे ही विकट समय में साहित्य और संस्कृति की पर्याप्त समझ रखने वाली अपनी टीम के साथ विनय जैसे संस्कृतिकर्मी एक पत्रिका के ज़रिये इस वैचारिक आन्दोलन को सालों से गति दे रहे हैं।उनके गहरे काम और तप को कला समय के पाठक ठीक से पहचानते भी हैं।इस पूरे काम में विनय जी के सम्पादन में उनके बहुमुखी फैलाव का दर्शन किया जा सकता है।''

इस तरह कुछ साथियों की तारीफ़ मैं पीठ पीछे करता हूँ, ताकि वे बहुत आगे बढ़ें।आज ही भोपाल के आईसेक्ट स्टूडियो में कवि और उपन्यासकार संतोष चौबे के निर्देशन में बनी संजा गीत की एक ऑडियो सी.डी. सुनी .गीतों के साथ ही सबसे ज्यादा प्रभाव विनय बाबू की लरज़ती आवाज़ से पहली मर्तबा वाकिफ हुआ।गज़ब है हमारी लोक कलाएं।अफसोस आज की यंग जेनेरेशन इनसे वाकिफ तक नहीं।खुदा करें ज़िंदा रहते वे तमाम अजानकार  लोग हमारी इस वैभवपूर्ण संस्कृति से एक बारगी रूबरू हो जाए।

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