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19 दिसंबर, 2013

20-12-2013


  • दिनों बाद आज का सवेरा शास्त्रीय संगीत की शरण में।हाथ में 'हिंदी साहित्य का इतिहास',दिमाग में तेईस दिसंबर से शुरू होने वाली परीक्षा और कान में विदुषी एन. राजम,सादगी की धनी (जैसा मैंने उन्हें देखने और मिलने पर पाया ) का वायलिन पर बजाये राग मालकौंस की यूट्यूब रिकॉर्डिंग।(खुद के भीतर जाने के लिए इतना दबाव काफी है )
  • गाँव के बच्चे ननिहाल जाने के लिए सर्दी/गर्मी या दिवाली वेकेशंस का वेट नहीं करते जब भी पिताजी से माँ की अनबन होती है माँ बकरियों और बच्चों सहित पीहर चली जाती है (आतमज्ञान)
  • लुप्तप्राय: भाव भोलेपन सरीखा तत्व गाँव में अवशेष है (आतमज्ञान )
  • परीक्षा और पढ़ाई की शक्ल महबूबा से नहीं मिलती है(आतमज्ञान)
  • जयपुर से अज़ीम प्रेम फाउंडेशन के युवा कार्यकर्ता अभिषेक कुमार का फोन मिला पूछ रहे थे चित्तौड़गढ़ और प्रतापगढ़ में कोई ऐसा नाम बताएं जो शास्त्रीय गायन की शिक्षा में गुरु के तौर पर काम कर सके.वे आने वाले दौर में एक संस्थान के ज़रिये संगीत,कला और संस्कृति की शिक्षा देना चाहते हैं. समझ के अनुसार नज़र दौड़ाई अफ़सोस जेहन में एक भी ढ़ंग का नाम नहीं उभरा।आप बताएँ। ऐसे मोर्चों पर पर मंच संचालन करते तथाकथित सूत्रधारों की वे सजी हुयी पंक्तियाँ याद करके खुद पर तरस खाता हूँ। जब वे कहते हैं कि यह धरती मीरा,प्रताप और कुम्भा की धरती है.भक्ति-शक्ति और संगीत से जुडी माटी है.मुआफ करना चित्तौड़/मेवाड़ से मुझे भी लगाव है मगर उन्ही पलों में मैं पहले अपने वर्त्तमान को टटोलता हूँ और अभिषेक के जैसे फोन पर प्रत्युत्तर में बस चुप हो जाता हूँ.यह हालात कमोबेश सभी छोटे शहरों के होंगे।जहां संगीत आदि ललित कलाओं के अच्छे और पारंगत गुरु नहीं मिल पाते।
  • दो काम नए किए,मतलब दिनों बाद किए:एक तो चौबीस घंटे का मौन और उसी मौन में सात किलोमीटर की शहर में ही पैदल यात्रा।एकदम विलग अनुभूति।एकांत।नदी।किला।सड़क।होरडिंग की इबारतें।बहुत सारे वाहन।हाथ में दो किताबों का बोझ,विचारों की बाढ़ जैसा कुछ
  • सुना है एनडीटीवी ने पच्चीस ग्लोबल लिविंग लीजेंड छांटे और उन्हें ईनाम भी दिया।अफसोस इस सूची में एक भी साहित्यकार नहीं था.यह अफ़सोस एनडीटीवी पर है.समारोह के कुछ अंश देखे मैंने जाना कि पंडित हरिप्रसाद जी चौरसिया के अलावा एक ने भी हिंदी में भाषण नहीं दिया।मतलब हिंदी भाषी को तो समारोह में जाने के अधिकार से पहले ही खारिज कर दिया गया था,अच्छा हुआ मुझे निमंत्रण नहीं मिला।नहीं तो शक्लें ही देखने में वक़्त गुजारना पड़ता।
  • यह बात सच है कि हम जीवन की इस दौड़ में बहुत आगे बढ़ जाना चाहते हैं और फास्ट कम्युनिकेशन के ज़माने में पोस्टकार्ड लिखना एकदम जुदा बात हो जागेगी फिर भी पोस्टकार्ड के अपने मायने हैं और आज भी देश में लाखों लोगों का वैचारिक आदान-प्रदान पोस्टकार्ड से ही होता है.पोस्टकार्ड लिखने की आदत भले बहुत कमजोर पड़ गयी है मगर हम मन में ठाने तो आज भी यह आसान काम कर सकते हैं.अपनी ही लिखावट में अपना सन्देश लिखना और अपने आत्मीय तक पहुँचाना हमें गहरा संतोष देता है.
  • छपना मेरे लिए गौण है छपने के बाद भी मैं खुद को 'सहज' रखने का तप रखता हूँ सो सफ़र ठीक से जारी है.मेरा स्पष्ट मानना है कि कविताओं में दम हो तो ही छपे बाकी 'सगे-सम्बन्धी' की तरह एक दूजे को छापना साहित्य का भला नहीं कर सकता है.एक और बात यह कि रचनाएं कमजोर हो तो रचनाकार को 'मना करने का साहस' बहुत कम सम्पादकों में होता है अमूमन वे लोक-लाज में प्रत्युत्तर नहीं देते,मेरी जानकारी में यह रवैया कोई ठीक इलाज नहीं है.
  • 'जोधपुर' से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका 'कृति ओर' के ताज़ा अंक में अपनी भी कुछ कवितायेँ प्रकाशित हुयी है.मेरी समझ में यही पहली ढ़ंग की पत्रिका है जिसने मुझे छापा है.
  • खुद के उच्चारण और लिखावट में आने वाली त्रुटियों और कन्फ्यूजन से बचने के लिए 'नालंदा विशाल शब्द सागर' नामक शब्दकोष खरीदा।(नोट:फिर भी अशुध्दियों के नहीं होने की गारंटी नहीं हैं)वैसे हमेशा अशुद्दियाँ अजाने में ही होती है ,पता चलने पर ही तो इस तरह के कोश काम आते हैं फिर वैसी गलती नहीं हो यही प्रयास सिंसियर होने की निशानी है

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