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05 दिसंबर, 2013

05-12-2013

आँखों का सालाना चेक-अप संस्कार आज की तारीख में पूरा हुआ।शहर में एक ही ढंग के नेत्र विशेषज्ञ है वे भी सेवानिवृत।सरकारी अस्पताल की सूची में तो आँखों की देखभाल के नाम पर एक भी नाम चस्पा नहीं है। अपनी दोनों आँखों से जोर लगाऊं तो भी दूर की चीजें साफ़ नहीं दिखती है।सो भविष्य भी कई दिनों से धुँधलाया हुआ ही समझ रहा हूँ।भूतकाल की तरफ देखने इतना वक़्त और ताकत कहाँ बची है।बस वर्तमान को सुधारने और उसी पर नज़र टिकाए हैं।कई सारी गलतफहमियों के साथ एक यह भी ढो रहा था कि चश्मा लगातार लगाए रखने से नंबर नहीं बढ़ते हैं।चश्मा नाक पर पहले भी टिकाए रखा है मगर नज़र है कि अर्थव्यवस्था की तरह कमजोर होती जा रही है।दोनों आँखों के चेक-अप की फीस सौ  रुपये पहले से नक्की है।यह कन्फ्यूजन अब भी है कि काणे आदमी के लिए फीस का क्राइट्रेरिया क्या रहेगा। चेक-अप का मामला एकदम सीध में चलता है।( पर्ची कटाने, टोकन लेने, कतार में लगने, अपॉइंटमेंट लेने जैसी प्रक्रियाओं से रहित चेक-अप था जो कई मरतबा अमूमन डॉक्टरों के यहाँ जाते रास्ते पर एक अतिरिक्त गम्भीरता लपेट जाते हैं), घंटी बजाओ, दरवाजा नौकर के बजाय डॉक्टर ही खोलता है मतलब सागवान की लकड़ी से बना वो नक्कासीदार दरवाजा खुले तो समझो आपका चेक-अप तय। डॉक्टर बड़ा दूरदर्शी है , बाहर की फाटक पर 'कुत्ते से सावधान' सरीखा बोर्ड भी नहीं लगा रख्खा।अपनी बारी के इंतज़ार के लिए एक बगीचा उगा रखा है यह अलग बात है कि इतने कम लोग आँखें चेक-अप कराते हैं कि जाते ही नंबर पक्का।आँखें सही होने और नज़र ठीक होने की गलतफहमी में हमारा देश साठ साल में इस रतौंधी तक आ पहुँचा है सोचकर ही मैं आँखें सालाना चेक कराता हूँ.आप ?

हाँ तो मैं कह रहा था कि पांच-दसेक स्लाइडों को एक नकली चश्में में फिट करके नंबर निकालने वाले साहेब ने बताया कि माइनस में पॉइंट पाव-पाव नंबर दोनों आँखें में बढ़ गया है। मतलब अबकी बार बनने वाले नए चश्में से दूर के आदमी की पहचान हो सकेगी।डॉक्टर के काम निबटने के साथ ही चश्में की फ्रेम का चयन पत्नी के जिम्में।फ्रेम से आदमी की इज्ज़त जुडी हुयी होगी शायद।(घर की इज्जत पत्नियों ने ही तो बचा के रखी हुयी है ,और हाँ सारी इज्जत/सम्मान बचाने का जिम्मा हमारे समाज ने स्त्रियों पर ही थोप जो रखा है,एक एक्जिट पॉल ये भी सुन लो कि जिस दिन स्त्रियों ने ठीक से अपनी आँखें चेक करा ली उस दिन से मामला उलटा पड़ सकता है ) काश नए नंबर के इस चश्में से मैं देश का भविष्य सही से देख पाता।चुनाव में सही उम्मीदवार का चयन कर पाता।कितना सुखद होता अगर यह चश्मा आज के दोगले और टेड़े आदमी की नियत भाँपने के काम आता।हम कब मना कर रहे हैं माना कि चश्में बड़े काम के औजार है मगर इनमें अभी पर्याप्त नवाचार की गुंजाईश है। कम्बल,बिस्कुट,जर्सी,साड़ियाँ बाँटने के चलन के बीच ही कुछ ढंग से विवेकवान चश्में भी हमें हमारे शोषित/पीड़ित और पिछड़े देहाती मित्रों को मुफ्त में बाँटने की सोचना चाहिए। 

इजाज़त दे तो कह दूँ कि एक चश्में की कीमत उससे पूछो जो जल्दबाजी और अतिउत्साह में चित्तौड़ से कोटा जाते समय ट्रैन और पटरियों के बीच की तंग दरार में जा फंसा और चश्मा तुड़ा बैठा। उनके पाँव में आए रेप्चर,रेप्चर पर हुए खर्चे,हालचाल पूछने आए दोस्तों के संवादों के बीच के हास्य पर ना भी लिखें तो भी बाद में जनाब के लिए बने बारह सौ रुपये के नए चश्में का जिक्र करना लाज़मी है।काला और एकदम गायक अभिजीतछाप चश्मा।मैंने भी तभी साक्षात जाना कि चश्में भी आदमी को स्मार्ट बना सकते हैं।एक विचार यह भी कि जिनकी दृष्टि पहले से ही साफ़/विवेकी/भ्रम रहित हों,उनके लिए चश्में सिर्फ सरकारी काम निबटाने के हित ज़रूरी है।लखटकिया मासिक पगार पर बारह सौ का चश्मा चलेगा मगर हमारे देश में कितने सारे लोग ऐसे भी हैं जिनके इतने में तो बारह चश्में बन जाए।खैर यहाँ रिपसने और विषयांतर की पूरी गुंजाईश है सो डायरी यही ख़त्म करते हुए नमस्ते।

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