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09 दिसंबर, 2013

09-12-2013

  • कल शाम चित्तौड़गढ़ के ज़िंक नगर स्थित खेल मैदान में 'विजयदान देथा' की रचना 'सपन प्रिया' का नाट्य मंचन देखा।चयनित दर्शकों के लिए आयोजित इस शाम में भाई विपुल शुक्ला ने सुबह ही फोन कर दिया था।इधर यह बात पक्की थी कि हमारे जैसे छोटे शहर में नाट्य मंचन/रंगकर्म की हलचलें नहीं के बराबर ही है  सो मन में उत्साह उमड़ आया (मुझे याद आता है कभी हमने ही स्पिक मैके के बेनर तले 'नगीन तनवीर' के निर्देशन में 'चरणदास चोर' करवाया था) यह मंचन भोपाल की नाट्य संस्था 'विहान ड्रामा वर्क्स' का था.अपरिहार्य कारणों से सात के तय समय से घंटे भर देरी से शुरू हुए मंचन ने मन मोह लिया।(आयोजनों देरी होने पर ये 'अपरिहार्य' शब्द बड़ा काम आता है) सर्दी बहुत थी. स्टेज पर साउंड और प्रकाश का बेहतर समन्वय था. संवाद भी कमोबेश अच्छे थे. सभी अभिनेता युवा थे. सजीव संगीत का आनंद अलग ही सुनाई पड़ रहा था.औपचारिकताएं नहीं के बराबर थी यों कहें थीं ही नहीं।ज़िंक के प्रमुख विकास शर्मा जो खुद साहित्य-संगीत से जुड़ेरहे हैं,उन्होंने तीन पंक्ति में अपना उदबोधन देकर अपनी समझ का अच्छा परिचय दिया। इतनी तेज सर्दी में उदबोधन कौन सुनता है.हालाँकि नाटक के विषय चयन को लेकर ज़रूर कहूंगा कि विषय कुछ यथार्थपरक होता तो मेरा खुद का मन ज्यादा रमता।(ये मेरी अपनी राय है)अब सपनेराजापरीरानीसुंदरतामाया यह सभी कुछ विमर्श के विषय नहीं रहे. हाँ नाटक में मूल्य आधारित सामग्री ज़रूर थी। आत्मग्लानि और ह्रदय परिवर्तन सरीखे मसले ज़रूर दर्शाए गए.निर्देशक भाई को कहना है कि अब भाई यह दौर रियलस्टिक होने का है ऐसे में यह कहानी और इसका विषय गौण ही लगेंगे ना..खैरआयोजकोंप्रायोजकों और उन युवा कलाकारों को बधाई कि इतनी सर्दी में भी उम्दा अभिनय किया। सबसे अखरने वाली बात यह कि दर्शक वर्ग जो कि अमूमन पढ़ा लिखा और सभ्य ही था,नाटक के समापन की घोषणा के दो मिनट पहले ही चल दिया.क्या हम नाट्य समूह को पैसे देने के साथ एक आदरढ़ंग से तालियांस्टेंडिंग ओबेशन देकर अपने सभ्य होने की पहचान नहीं दर्शा सकते हैं.भोपाल के वे रंगकर्मी साथी चित्तौड़ के दर्शकों की क्या निशानी लेकर गए होंगे।(दिल में पीड़ा है)
  • एक अनुभव आधारित बयान यह कि पढ़े लिखे लोग 'सभ्य' हों ही ज़रूरी नहीं
  • चुनाव के चयनितों को बधाई
  • एक शाम साथी राजेश चौधरी जी के घर बीती।सर्दियों की शाम में अस्पताल के आउटडोर बंद होने के वक़्त से राजस्थान में दारू की दुकाने बंद होने के समय से ठीक पंद्रह मिनट पहले तक राजेश जी के घर रुका।बहुत से मसलों पर बातों के साथ जो ख़ास हुआ उसमें मैंने ज्ञानरंजन की कहानी 'पिता ' का पाठ किया सुनने वालों में राजेश जी के अलावा सुमित्रा भाभीजी भी थीं.दो पीढ़ियों के बीच के वैचारिक अंतराल को बयान करती कहानी है 'पिता '. पाठ करने की अदा और चस्का विविध भारती के एंकर युनुस भाई के रविवार को प्रकाशित होने वाले ब्लॉग 'कॉफी-हाउस' से लगा.खैर,नयी कहानी पर देर तक राजेश जी से चर्चा भी हुयी।उनके पढ़ाकू होने की हद का मैं कायल हूँ.खासकर नया जो कुछ छप रहा है उसका।क्लासिक्स में उनकी रूचि शुरू से रही नहीं।हमने कुछ और कहानियों की भी चर्चा की जिनमें 'पत्नी','टूटना','ज़िंदगी और जोंक','वापिसी'
  • बस नहा-धो कर चित्तौड़ कलेक्ट्रेट जाने का मन है जहां परिणामों के रुझान जानने के हित हुजूम लगा हुआ है इस तरह के माहौल का भी अपना आनंद है.जीतों चाहो कोई भी.आनन्द ऐसे हुजूम के बीच बातें सुनने और कसाय ठोकने का ही होता है.राष्ट्रीय टीवी चैनलों पर राजस्थान की चुनाव सम्बन्धी बारीक डिटेल्स नहीं मिल पा रही थी,इधर केबल कनेक्शन पर भी ईटीवी नहीं आ रहा था अब इंटरनेट पर ईटीवी देख पा रहा हूँ.
  • भाई अशोक कुमार पाण्डेय का कविता संग्रह और मेरी प्रिय पुस्तकों में से एक 'लगभग अनामंत्रित' पर हमारी रेणु दीदी की पाठकीय राय 'चौथी दुनिया' में छपी है , खरीद कर पढ़ी गयी और मित्रों में जबरन पढ़वाई गयी पुस्तकों में यह पहली पुस्तक है.

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