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04 दिसंबर, 2013

04-12-2013 (Second)

जिनसे महीने में एक बार बाल कटवाता हूँ उनका नाम जगदीश हैं,जिनसे हर तीसरे दिन सब्जी खरीदता हूँ उन चयनितों के नाम शान्ति,रामनाथ बा,अणची बाई है.एक वो शंभू है जो मेरे ,पत्नी के ,मेरे पिताजी के,माताजी के मोबाइल में रिचार्ज कूपन डालता है.सारे कनेक्शन बीएसएनएल के हैं मगर शंभू खुद आइडिया का वापरता है खैर.हाँ तो मैं कहाँ था,सिटी वाली बड़ी सब्जी मंडी के कौने में एक नया मंदिर बना है साईं बाबा का.हर गुरुवार को बड़ी  मतलब ज्यादा भीड़भाड़ रहती है.मंदिर के कौने पर जीतेन्द्र जलेबी का थैला लगाता है वहीं अपुन भी कभी-कभी सपरिवार जलेबी चख आते हैं.कलेक्ट्री के रास्ते पर एक पूर्णिमा समोसे वाला है सुबह समोसे के अलावा पोहे भी बनाता है  अप्पन उसके भी पक्के वाले ग्राहक हैं वहाँ तीन-चारेक साथी काम करते हैं जो मुझे क्रेडिट के आधार पर भी समोसे उधार दे देता है उसका नाम गजेन्द्र हैं.

हाल ही में मैंने जाना कि दूध डेयरी वाले गुड्डू का नाम असल में मुकेश है.बिजली और नल के बिल लाने वाले जनाब का नाम भैरू लाल है। डाकबाबू से भी थोड़ी सी फुरसत में हुयी गुफ्तगू में जाना कि वे श्रीमान रमन सिंह हैं.अखबार वाले हॉकर को मैं उसी के सही वाले नाम सलीम से बुलाता हूँ.टीवी केबल वाला निजाम है जो महीने के महीने आता है ये अलग बात है कि केबल की खराबी के चलते मैं उसे महीने में दसों बार फोन लगाके निजाम बुलाता हूँ.हमारे ऑफिस वाले बाबू का नाम कन्हैया लाल है सभी उन्हें कान्हा उस्ताद कहते हैं.हम अभी इतने रईसजादे या कमजोर नहीं हुए कि बाईजी हमारे घर झाड़ू-पौछा करने आती वरना उसका नाम भी यहाँ लिख देते।

शहर में दो ही पुस्तक भण्डार है एक रोडवेज पर जहां जहां हँस नहीं मिलती वहाँ रमेश बैठता है दूसरा भण्डार रेलवे स्टेशन पर है वहाँ किसी अग्रवाल परिवार के कई बंधू बैठते हैं अब नाम में क्या रख्खा है.एक और आख़िरी नाम लिखना ज़रूरी है जो मेरी बाइक की हर ढ़ाई हजार किलोमीटर की रीडिंग के बाद सर्विसिंग करता है उसका नाम प्रिंस है.ये वो नाम है जिन्हे अक्सर हम पूछना/जानना/लिखना/बतियाना इतना ज़रूरी नहीं समझते हैं कितनी गलत बात है. क्या इन सभी के बगैर आपका जीवन सुगम है ?

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