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20 दिसंबर, 2013

20-12-2013

हालात:''बहुत कन्फ्यूज हूँ.मैं आम आदमी हूँ.अक्सर ये बड़े लोग मुझे कन्फ्यूज मॉड में रखना चाहते हैं.मुझे खाने,कमाने और टीवी के कार्यक्रमों से ही फुरसत नहीं है.(टीवी का मतलब मेरे लिए भी आपकी तरह ही आकाश से जो परोसा जा रहा है उसे सिर्फ स्वीकारना है ,प्रतिकार का कोई तरीका मुझे भी नहीं सुझाया गया है ). अगर खुद को पढ़ा लिखा 'जड़' और 'विवेकहीन' कहूँ तो हाँ मैं अधिकाँश समय आज भी एक 'बाबा की कृपा' वाले नुस्खे पर यकीं करता हूँ.मैं बहुत जल्दी में हूँ.कहाँ हूँ पता नहीं।इस सम्पूर्ण धुँधलके में मंझिल पा गया तो बता दूंगा।''-(देश के बड़े हिस्से में रहते कन्फ्यूज लोगों का एक प्रतिनिधि बयान)


आभासी खुशियों में मशगूल और आनंदमयी जीवन जीने वाली पीढ़ी के देश का बड़ा हिस्सा कुछ ना करें बस एक बार 'मुजफ्फरनगर' हो आए तथाकथित मानवीय विकास का सारा नशा उतर जाएगा।आदमीजात पीड़ा में है( मेरी नज़र में आदमी 'बेजात' होता है बाद में 'जात' उस पर थोपी जाती है),मानवता पर संकट है और हम फेसबुक प्रोफाइल फ़ोटो बदलने में मशगूल हैं.खुद को शर्मशार लोगों में शामिल समझते हुए कहना है कि इस देश को ऐसे ही रचनाकारों की ज़रूरत है जो संवेदना में साहित्यकार हो,दृष्टि में समाजशास्त्री और चिंतन के नाम पर यथार्थवादी वैज्ञानिक हो.अड़भोपे टाइप की बुद्धि के ये 'नेतृत्वकर्ता' हमें नहीं चाहिए।कभी कभी सिलेबस का अकादमिक हिस्सा भी मन मोहने वाला होता है.इधर सर्दी का भारी पड़ाव है और परीक्षा के चलते हाथ लगे हरिशंकर परसाई का लिखा व्यंग्य 'ठिठुरता हुआ गणतंत्र' पढ़ा तो फिर से लगा कि मेरे सहित  मेरे देश की इस ठिठुरन को शायद कोई समझे।

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