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21 दिसंबर, 2013

21-12-2013

  • सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में 'अधपके लोग' जब खुद को 'पका' हुआ ही मान बैठे हों तो समझो उन 'अधपकों' को किसी का बाप भी नहीं पका सकता है.(आतमज्ञान)
  • अफसोस,इन सालों में,बहुत कुछ भूली बिसरी यादों के खाते में चला गया गोया आज़ाद आँगन में टहलना,अपनों के बीच हँसना,बच्चों के बीच उन्हीं से बतियाना,बेख़ौफ़ साँस लेना,खुशहाली के सपने देखना,मन का पहन घुमक्कड़ी करना,पसंद की जींस,पसंद के शर्ट पहन इतराना,पहाड़ों की टोह लेना,नदी से उसका हाल पूछना,टीवी को फटकारना,दोस्तों में खुलना,गोष्ठी की जाजम बिछाना,आलोचकों के बीच कविता पढ़ना/सुनना,दोस्तों के कैमरे से खुद की दूसरों को दिखाने लायक फ़ोटो उतरवाना।
  • चित्तौड़गढ़ की हिंदी का हाल: कनक बाबू स्कूली परीक्षाओं में व्यस्त हैं, रेणु दीदी राजस्थान विश्वविद्यालय के लिए प्रोफेसरी का एक इंटरव्यू देकर फारिग हुई हैं, राजेन्द्र सिंघवी न्यू जलपाईगुड़ी-शिलोंग-दार्जिलिंग-गुवाहाटी(कौनसा स्टेशन किसके बाद/पहले आता है मैं नामलुम हूँ) की यात्रा पर चल पड़े, इधर राजेश चौधरी सपत्नीक त्रिवेंद्रम जाने वाले हैं.सत्यनारायण जी व्यास घर पर ही हैं.शिव मृदुल जी से आज ही पता चला वे तबियत के लिहाज से ठीक हैं मेवाड़ विश्व्विद्यालय में ही अपनी सेवानिवृति के बाद की नौकरी बजा रहे हैं.नयी हिंदी पीढ़ी में मेरे अलावा विकास अग्रवाल है जो कल से हिंदी में अपनी एमए प्रीवियस की अपनी परीक्षाओं को लेकर हिचकोले खा रहा है.बाकी की हिंदीछाप पीढ़ी फरवरी में आने वाली सेकण्ड ग्रेड प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में व्यस्त है।मित्रों में महेश तिवारी जी और अखिलेश चाष्टा जी हैं उनसे बात किए समय हो गया.
  • अनपढ़ आदमी हूँ,इधर ज़माने की इस नयी हवा ने बहुत भ्रमित कर रख्खा है,मेरा आसपास मुझ पर फब्तियाँ कसता है कि 'वक़्त से बहुत पीछे चल रहा हूँ'.एक घड़ी देखना ही तो आता था, अब तो घड़ी घूम जाने से खुद को और ज्यादा दिशाभ्रमित अनुभव कर रहा हूँ.दिन में दसों बार घंटाघर की याद आ पड़ती है.क्योंकि ज़माने की इस बेतरतीब हवा से तो सही समय थाह पाना बहुत मुश्किलाना काम है.(आतमज्ञान)

  • चित्तौड़गढ़ में कल से भयंकर कोहरे वाली ठण्ड है इस वाक्य में 'भयंकर' का मतलब वाकई 'भयंकर' ही है.
  • आसपास की बात करें तो चित्तौड़गढ़ में भी 'संस्कार भारती' नाम का संगठन अपनी शाखा खोलने वाला है.बहुतों को उस पाले की तैयारी बैठक में देख अचरज नहीं हुआ.क्या पता शायद इस संस्था से ही हमारी चित्तौड़ की सांगीतिक विरासत को गति मिलें। इधर बीते सप्ताह घर आयी एक चिट्ठी से पता यह साल मीरा स्मृति संस्थान,चित्तौड़गढ़ का रजत जयंती वर्ष है. इसका मतलब यह हुआ कि सत्यनारायण समदानी जी के सचिव होने का भी यही रजत जयंती वर्ष है.तीन दिन पहले एक अखबार में पेंशनर्स दिवस की ख़बर में बतौर वक्ता आदरणीय समदानी जी का नाम 'साहित्यकार प्रो सत्यनारायण समदानी' लिखा पाया।वहीं डॉ ए. एल.जैन साहेब की चित्तौड़गढ़ में 'जैन दर्शन का इतिहास' विषयक पुस्तक आने की भी सुगबुगाहट है. राष्ट्र बड़े-बड़े मुद्दों से गुत्थमगुत्था हो रहा है और शहर के सारे कवि सो रहे हैं।देश के नामी राजनेताओं को छोड़कर किसी भी किस्म और वाद से जुड़े साहित्यकार, संगीतकार, फिल्मकार, रंगकर्मी के मर जाने पर हमारे शहर में एक भी श्रृद्धांजलि सभा नहीं होती।मतलब चलन नहीं है.राष्ट्रीय मसलों पर चर्चा करने के लिए यहाँ कोई कॉफी हाउस नहीं है.जहां कॉफी हाउस बन सकते थे वहाँ 'पीने की सविधा के घर' बना दिए.एक भी सभागार नहीं है जो नि:शुल्क मिल सके.सबकुछ ठण्ड की तरह ठंडा।कुम्भानगर रेलवे फाटक पर ओवरब्रिज अभी पूरा नहीं बना है.चित्तौड़ से निम्बाहेड़ा की रोड़ फोरलेन में तब्दील होना शुरू हो गयी है

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