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20 मार्च, 2014

20-03-2014


बीते साल हमने बस्सी की काष्ठ कला पर एक रूपक बनाया था.नटवर त्रिपाठी जी के साथ की वो यात्रा और प्रवीण कुमार जोशी के आलेख पर बना वो रूपक अब भी स्मृति में है.इधर हमने आकाशवाणी चित्तौड़गढ़ के कार्यक्रम प्रमुख चिमनाराम जी के निर्देशन में बीते रविवार चित्तौड़ जिले के आकोला गाँव में दौरा किया.'आकोला की दाबू छपाई कला' पर केन्द्रित एक रेडियो रूपक का निर्माण हुआ.यात्रा बड़ी दिलचस्प रही.


सुबह के दस बजे.कार में ड्राइवर सहित चार साथी.चित्तौड़गढ़ से कपासन की तरफ का फोरलेन रोड.मस्त ड्राइविंग.चिमनाराम जी का दर्शन और बीच-बीच में माधुरी से गुफ्तगू.साथ में फिमेल आवाज़ के तौर पर माधुरी सोनी थी.माधुरी नागौर की है.बीते साल ही ब्याह के बाद चित्तौड़ आयी.पति इंजिनियर.फेक्टरी में बड़ी नौकरी.शुरुआती बातों में ही मैंने अपना पूंजीपति वर्ग और रईसी जीवन के प्रति विरोध जता दिया.फिर तो बातें करने में हमारी फ्रीक्वेंसी मेल खाने लगी.यहाँ रईसी जीवन शैली के विरोध से मेरा मतलब कॉन्सेप्ट में सही होना था कि जीवन सभी जगह है.आनंद और उल्लास वहाँ भी हैं जहां एक आदमी फेक्टरी की कोलोनी वाले फ्लेट कल्चर से रहित जीवन जीता है.जीवन वहाँ भी है जहां एक परिवार अफीम की चिराई-लुआई के दौरान खेत में ही जुगाड़ वाले घर में रहता-खाता और सोता है.खैर यहाँ विषयांतर होने के पूरे चांस हैं.फिर भी बता दूं कि हम आकोला जैसे गाँव में जा रहे थे. एक गाँव की यात्रा के लिए हमें गाँव के स्तर वाली फ्रीक्वेंसी पर जाकर सोचना और समझना ज़रूरी हो जाता है.

रास्ते में दीवाना साहेब की दरगाह पड़ती थी.नामचीन दरगाह.इस लोकप्रियता से हम भी अछूते नहीं थे.लगे हाथ दर्शनलाभ लिया.दर्शनीय धार्मिक स्थलों पर मेरा एकमेव आकर्षण आए हुए जातरियों की जीवन शैली देखना और निहारना ही रहा है.दर्शन का अर्थ मेरे लिए ज़िंदा आदमी से बातचीत से लिया जाना चाहिए.शाब्दिक और अशाब्दिक बातचीत.दरगाह बहुत अच्छी तरह से बनी हुयी थी.दे लम्बे-चौड़े चौगान,आरामघर,धर्मशालाएं,टट्टी-पेशाब के लिए पर्याप्त सुविधाएं.बहुत सारे कुसलखाने.भोजनशाला का बड़ा आँगन.इस तरह आस्था का सैलाब देख हम दरगाह संस्कृति पर देर तक बातें करते हुए हम कई सूफी संतों की चर्चा से गुज़रे इतने में भूपालसागर आ गया जहां से आकोला मात्र पंद्रह किलो मीटर था.यहाँ से सन्डे की छूट्टी पाकर हस्तीमल जी कोठारी भी हमारे साथ हो लिए.

गाड़ी सीधे एक संकड़ी सडक के सहारे मिनटों में ही आकोला जा पहूंची.बेडच नदी के किनारे.गाँव को दो फाड़ करती है बेडच.मगर बारिश को छोड़ यहाँ पानी देखने नहीं मिलता.स्क्रिप्ट का पहला-दूसरा ड्राफ्ट हम पढ़ चुके थे.रूपक लिखने वाले समाजशास्त्र के कॉलेज व्याख्याता डॉ हस्तीमल कोठारी का हमारे साथ होना एक बड़ी सहूलियत साबित हुआ.इस रूपक के बहाने मैंने पहली मर्तबा अपने ही जिले की बहुत ज़रूरी आर्ट को देखा और जाना. वहाँ के कारीगरों के यथार्थ से परिचय हुआ.उपरी आकर्षण के बीच के संघर्ष की कहानी है आकोला की दाबू प्रिंट.वक़्त के साथ मूल काम से फिसलते हुए दूजे काम धंधों की तरफ का निकास दिखाता है आकोला.ज्यादा मेहनत के बाद मिलने वाले कम दाम से दुखी कामगारों की स्टोरी है आकोला.और भी बहुत कुछ.पहला परिचय कारीगर सुरेश छिपा की घरवाली सुशीला से हुआ.लट्टे पर नेप्थोल छाप रही थी.उठी,हाथ जोड़े,कुशलक्षेम पूछी.कोठारी जी पूर्व परिचित थे.फिर बेटी पूजा आयी.कोई दसेक मिनट में चाय कपों में चाय आ गयी.बेटा नदी के पार कारखाने जाकर सुरेश जी को बुला लाया.बारी-बारी से हम इंटरव्यू लेने लगे.पूरा परिवार हमें किसी तारणहार की तरह ट्रीट करता रहा.अपनापन और पूरी सहजता.

गाँव में दो सौ घर छिपों के.सौ घरों में आज भी यही रंगाई-छपाई.यह जाति मेवाड़ राजवंश से ही यह पुश्तैनी काम करती रही.लोग गाँव छोड़ गए भी मगर काम भी यहीं छोड़ गए.दाबू प्रिंट के ज़रिये फेंटया,ओढ़नी,सलवार शूट,बेडशीट बनाने वाले कामगारों को रंगते-छापते और कुण्डियों में कपड़े जकोलते देखा.हर दूसरा घर और यही दाबू प्रिंट का राग-विराग.युवा कम ही दिखे.जवान और बूढ़े अधिक थे.यहाँ बूढ़े का मतलब अधेड़ उम्र ही हो क्योंकि इस मेहनती काम में मजबूत शरीर चाहिए ही.फिर हम एक दो कारखानों में और गए.यहाँ के अवार्डी कारीगर और लगभग अच्छे व्यवसायी भेरुलाल छिपा से मिले.कोई पचासेक की उम्र के होंगे. दो बेटे हैं दोनों इसी धंधे में लगे मिले.कपड़ों की गांठे बंधकर दूसरे शहरों में भेजे जाने के लिए तैयार थी.माल रखने के लिए एक बड़ा गोदाम था.नौकर थे,चाकर थे.बाहर एक बाड़े में कपड़ों को सुखाते,निचोड़ते मजदूर.छिपा के अलावा जातियां भी मजदूरी कमा रही थी.

यहाँ दाबू प्रिंट के बने फेंटये लोकप्रिय हैं.यानी गुर्जर,जाट और रेबारी औरतों के घाघरे.दौ सौ रूपए मीटर.सबसे छोटी साइज ही छ मीटर से शुरू.बारह सौ रूपए का एक घाघरा दो साल चलता है.मोटा कपड़ा जिसपर मेहरून और नीले रंग का कमाल फबता है.बड़ी ज्ञानवर्धक यात्रा.अमीर आदमी महंगा वाला घाघरा ख़रीदे तो भी कोई ढाई हज़ार से पैंतीस सौ रूपए तक पड़ जाता है.ज़माने के हिसाब से ये लोग अपने रंग,डिजाइन और उत्पाद बदलने लगे हैं.बंधेज का भी काम करने लगे हैं.प्राकृतिक रंगों से कुछ हद तक केमिकल रंगों पर सरक गए हैं.हम एक वर्कशॉप में गए वहाँ राजस्थान से बाहर के भी रंगरेज कामगार और मजदूर के रूप में लगे हुए मिले.आगरा का सुरेन्द्र मिला,फरीदाबाद का प्रवीण कुमार कश्यप मिला.गुना की संतरा बाई मिली.कोई दाबू बना रहा था,कोई कपड़ों से दाबू छुडा रहा था.कोई नेप्थोल छाप रहा था तो कोई मेहरून रंग के लिए कपड़ों की धुलाई कर रहा था.सब के पास बहुत सारा काम था और दिन था की शाम की तरफ बढ़ रहा था.सुपरवाइजर का डंडा कायम था.टार्गेट अलोट किए हुए थे.मेहनताना बंधा हुआ था.पेट की आग का सवाल था.रंगाई-छपाई का ये माल जो भी चाहे ख़रीदे और चाहे जितने में ख़रीदे इन कर्मचारियों को पगार से लेनादेना था जो कभी कभार ही बढ़ती थी.बाज़ार और बड़ी फेक्टरियों के दबाव में हस्तकला मर रही थी जिसके हम चश्मदीद गवाह थे.हमारा रूपक उनके घरों में रोशनी फूँक सकेगा यह मात्र आशा ही थी.वैसे भी आस के सहारे ही रास्ते कटते हैं.

हमारे में से एक दो ने बेडशिट खरीदी,कइयों के मूल्य पूछे,कई सलवार शूट उलट-पुलट कर देखे,रंगते-छपते कपड़ों को छू कर देखा.घरों में नंग बांधती और बंधेज तैयार करतीं औरतें देखी.दिन का वक़्त था गाँव में बच्चे गायब थे.सन्डे के बावजूद दाबू के काम में बच्चे आसपास भी नहीं फटकते दिखे.मतलब उनकी रूचि साफ़ है.जितने लोग मिलें कमोबेश सभी के हाथ काले-कलूटे,मगर जाना कि इन रंगीन हाथों से भोजन करते वक़्त कोई नुकसान नहीं है.लोग बस अपनी रोटी के जुगाड़ में धंसे दिखे.कोई बड़ी रोनक नहीं थी.सरकारी मदद से किसी बड़े काम की आस वे कबके खो चुके थे.परिवारों के आपसे समीकरण उनके माथों और बातों पर साफ़ असर दिखा रहे थे.कइयों की बोलचाल बंद,कइयों का आपसी आवन-जावन बंद.कामगारों में अधिकाँश भाईबंद ही थे.कुल जमा तीन-चार गोत्र के परिवार.पूरा गाँव छिपों का आकोला था मतलब हर तीसरा घर छिपा जाति का.और हर दूसरा छिपा परिवार रंगरेज बना था.कारखाने लगाने की हिम्मत दो सौ परिवारों में से कोई पाँचेक ही जुटा सके.जहां कारखाना होगा वहाँ कुंडी होगी,पानी का टेंकर होगा.रंग की कुण्डियाँ होगी.बड़ी जंगी टेबलें होंगी,कारीगर होंगे,कामगार होंगे,मजदूर होंगे.

आख़िरी बातचीत अस्सी साल की बुढ़िया राधा बाई से हुयी थी शायद जो आज भी बंधेज के लिए कपड़ों पर नंग बाँधने का काम करती थी.कहती हैं आज भी मौका मिलता है तो नंग बाँध लेती हूँ मगर अब उतना काम नहीं होता.यहाँ आज की बहुएं ये काम कम ही करती हैं.खाने-पीने और बच्चों से फारिग होकर वक़्त मिलता है तो कर लेती है थोड़ा बहुत.पहले वक़्त दूसरा था जब मोहल्ले की सारी औरतें एक जगह बैठकर बातों के फटकारे उडाती हुयी नंग बांधती थी.गीत गाती थी.नंग हर समाज की औरतें बाँध लेती है.आते समय गाँव से चार किलो मीटर दूर बने कॉमन फेसिलिटी सेंटर की खंडहरी हालात देखी.योजना बंद,काम बंद,सोसायटी सुस्त,तालों,किंवाड़ों को जंग.ऊपर से शुभ-शुभ कहने और दिखने वाली आकोला दाबू प्रिंट के लिए आज भी बहुत कुछ किए जाने की ज़रूरत है.खैर लौटते में हमने भूपाल सागर रेलवे स्टेशन के बाहर एक ठेले पर गरमागरम मिर्ची बड़े खाए और हस्तीमल जी को उदयपुर के विदा किया.मशगूल इतने हुए कि  हम भी भूल गए थे कि अपने घरों में किसी को सुबह छोड़ कर आए हैं.अपने-अपने घरों से फोन आने लगे थे.बस फिर तो हम चित्तौड़ लौट आये.ऐसे बीता एक यादगार दिन.आकोला के नाम.

सूचनार्थ बताना चाहूँगा कि यह रूपक आकाशवाणी जयपुर-अजमेर से बीस मार्च,2014 को रात दस बजे प्रसारित होगा.आकाशवाणी चित्तौड़गढ़ से इसका प्रसारण बीस मार्च को रात पौने आठ बजे किया जाएगा.इस रूपक में वाचन स्वर है हमारे युवा दोस्त संयम चंद्रा और वृतिका सालवी का है.

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