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16 फ़रवरी, 2015

श्याम बेनेगल

                               अक्टूबर 2009 के ज्यादातर दिनों में मासिक रूप से आने वाली जरूरी पत्रिकाओं के साथ आकाशवाणी चित्तौड़गढ़ की लाईब्रेरी से बहुत ढूंढने-ढांढणे के बाद मिली सिनेमा के बारे में बहुत कुछ खुले रूप में कहती एक अच्छी किताब पढ़ रहा था। वाणी प्रकाशन, दिल्ली की 2006 में पहली बार छपी 495 रूपये की लगभग 515 पेज वाली सजिल्द किताब अभी भी पढ़ रहा हूं, बड़ी दिलचस्प और पढ़ने लायक है। वाकई सिनेमा: कल, आज, कल नाम वाली ये किताब फिल्मों के जानकार विनोद भारद्वाज ने बहुत मेहनत से लिखी होगी।

                             पढ़े हुए कई सारे विचारों में से आज सबसे खास 1955 में बनी चर्चित फिल्म पथेर पांचाली के निर्माता सत्यजीत राॅय और समकालीन विचारावान फिल्मों के निर्माता श्याम बेनेगल पर लिख रहा हूं। बचपन में कभी-कभार पैसे मांग-तुंगकर गांव में आने वाला विडियो देखते थे, थोड़े बड़े हुए तो पढ़ने-पढ़ाने और कुछ बनने में उलझ गये। मेहनत के बाद मास्टर जी की नौकरी मिली, इस सफर में यदा-कदा ही थियेटर में जाकर फिल्में देखने का मौका मिला। घर पर टीवी बरसों बाद देखने को मिली मगर तब भी फिल्मों की परख और उनका चयन हमारे बस का नहीं था। एक कलावादी संगठन स्पिक मैके और कुछ जागरूक साथियों के कहने पर कभी ‘सुरज का सातवां घोड़ा’ और ‘चार्ली चेपलिन’ की ‘द गोल्ड रश’ जरूर देखी थी। देखने वालों को जरा भी अच्छी नहीं लगने वाली इन फिल्मों पर चर्चा तो बहुत दूर की बात थी। वैसे भी हमारा आस-पास तो यही मान बैठा है कि सिनेमा का मतलब मनोरंजन ही है। पिछले दिनों एक आॅनलाइन मिडिया मैगजीन में पढ़ा था, सिनेमा में बहुत ताकत है। अफसोस इस बात का है कि विचारों को बदलने का माद्दा रखने वाली ‘सन्त तुकाराम’, ‘भुवन शौम’, ‘नागरिक’, अजान्त्रिक’, ‘उसकी रोटी’, ‘अंकुर’, भूमिका जैसी फिल्में हमें देखने को ना मिली। स्पिक मैके के राष्ट्रिय स्तर के आयोजनो में श्याम बेनेगल की समर और सत्यजीत राॅय की पारस पत्थर देखते वक्त आनन्द आया लेकिन देर तलक सोचते रहे कि ज्यादा लोकप्रिय नहीं हुई, ये फिल्में जबरन हमें क्यों दिखाई गई। विनोद भारद्वाज की गहरी जानकारियों वाली इस किताब के पन्ने पलटने के बाद लगा की उस जमाने में भी विदेशों के फिल्म समारोह के लिये चर्चा का विषय बनने वाली इन फिल्मों कुछ तो था।

                             1896 से शुरू होने वाले गुंगी फिल्मों के इतिहास में बोलती फिल्में 1930 से आने लगी, और बाद में कई बार महाराष्ट्रीय और बंगाली संस्कृतिपरक फिल्में बनी जो कई बार तो साहित्यिक कृतियों को आधार बनाकर बनायी गई। सिनेमा को प्रदेश, भाषा और देश की सीमाओं से बहुत दूर रखते हुए सार्वभौमिक बनाना सत्यजीत राॅय ने सीख लिया था। शास्त्रीय संगीत के रागों का प्रयोग करके बनायी गई फिल्में मानसिक रूप से थोड़ा अलग सा प्रभाव छोड़ती है, ये बात राॅय और बेनेगल जानते थे । सामाजिक मुद्दांे को ध्यान में रखते हुए फिल्में बनाकर बेनेगल एक आम आदमी के सामने आने वाली मुश्किलों को परदे पर रखते हैं जो रोजी-रोटी से जुड़ी होने के कारण ज्यादा आकर्षक और एकदम विरोधी होती है। भले ही फिल्मों से नुकसान में रहे मगर एक हद तक हमेशा क्लासीक कहलाने वाली ये फिल्में, फिल्मकार का समाज और देश के लिये अपने दायित्वों को पूरा करने की बात भी कहता है।

                              आज तो समय बहुत बदलाव ले चुका है, जहां देश के कई रचनाकार कैमरे के जरिये अपनी डाक्यूमेन्ट्री फिल्मों में कुछ गहरा काम करने की ओर हैं। सिनेमा की ताकत को समझने के लिये मनोरंजनपरक फिल्मों को छोड़ कभी-कभार मानवीय संवेदनाओं और समकालीन विमर्शों पर आधारित कुछ सुगठित फिल्में भी देख लेंगे तो हमारा कुछ नहीं जायेगा। पिछले कुछ सालों में आई, मेरी मनपसन्द फिल्मों में शायद कुछ अलग है जैसे - ‘बागबां’, ‘लगे रहो मुन्नाभाई’, ‘वेलकम टू सज्जनपुर’ शामिल हो सकती है। आज जब भी कुछ अलग तरह की फिल्म टीवी पर दिख जाती है तो रिमोट बटन आगे नहीं बढ़ता है। अब फिल्मों को लेकर मेरी पसन्द, विचार, चयन और चर्चा कुछ बदली-बदली सी है, जल्दी ही टाइम निकालकर सत्यजीत राॅय की ‘जलसाघर’, ‘पथेर पांचाली’, ‘पारस पत्थर’ और बेनेगल जी की ‘अंकुर’, ‘मंथन’, ‘कलयुग’, ‘जुनून’, ‘भूमिका’ देखुंगा। आज जाकर समझ में आया कि मणि कौल, कुमार शहानी, विमल राॅय, गुरूदत्त, ऋत्त्विक घटक, एम.एस. सथ्यु, अडूर गोपाल कृष्णन, शहीद मिर्जा, नीरद महापात्र जैसे जमे हुए फिल्मकारों ने अपनी नवोदित विचारधाराओं को लेकर बहुत बड़े-बड़े काम किये हैं। कुल मिलाकर एक किताब पढ़ने, एक गोष्ठी करने, एक किताब लिखने, एक विचारवान आदमी से मिलने और एक साहित्यिक सम्मेलन में भाग लेने जितना बड़ा काम ही किसी चयनित, गहरी और मुद्दों पर आधारित फिल्म देखना और उस पर चर्चा करना है।

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