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02 नवंबर, 2018

कुँअर रवीन्द्र:बेहतर आदमी होने की तरफ एक आदमी

कुँअर रवीन्द्र:बेहतर आदमी होने की तरफ एक आदमी

अंतरजाल की दुनिया में बहुतेरे जुगाडू किस्म के साथियों को एक तरफ रख दें तो यहाँ कुछ नेकदिल सृजनधर्मी ठीक सामने चमकते दिखाई देते हैं। गौरतलब है कि यह अतिरिक्त चमक उनकी अतिरिक्त आदमीयत की वजह से है। एक अनुभूति यह भी कि कुछ लोग अपने घरों से ही दूसरों के हित सोचने-खपने-रचने निकलें हैं। हमारे वर्तमान साहित्यिक-सांस्कृतिक परिदृश्य में बहुरंगी झमेलों और विवादों से सनी नेटवर्किंग साईट पर कुछ सृजनपरक व्यक्तित्व दूर से ही सकारात्मक ऊर्जा बिखेरते नज़र आते हैं। उनके होने से यह नज़ारा खुशनुमा और बेलेंस बन पड़ता है। अपने होने के अहसास की चिंता से ज्यादा नि:स्वार्थ भाव से अपनी सार्थकता सिद्ध करने में लगे लोग भी यहाँ मौजूद हैं, जिनकी फेहरिस्त में अपनी यात्रा की शुरुआत से ही विशिष्ट जनपक्षधर रवैया रमा हुआ महुसुसा गया है। ऐसे सहूलियतभरे लोग भला हमारा ध्यान क्यों नहीं खींचे। हमारे बीच कुँअर रवीन्द्र ऐसे ही सलीकेदार इंसान के रूप में एकदम फिट बैठने वाले शख्स साबित हुए हैं। आभासी दुनिया के सबसे बड़े नेटवर्क फेसबुक पर हुयी मुलाकातों-संवादों के कई हिस्सों को आधार मानू तो कुँअर बाबू में उनके संपर्क में आये मित्रों पर सीधे अन्दर तक असर करने का स्वाभाविक कौशल मौजूद दिखा हैं। कई बहानों से उनका सृजन दिन उगते से लेकर रात तक येनकेन हमारी आँखों के आगे आ ही जाता है। कविता पोस्टर्स, पुस्तकों के कवर पृष्ठ हों या फिर नामचीन से लेकर कम लोकप्रिय लघु पत्रिकाओं के आवरण, सभी में रवींद्र भाई की फुरसत का समाजसापेक्ष उपयोग देखा जा सकता है। ठीक से पड़ताल करें और गहरे में जाकर उनके काम को निहारें तो मिनटों में हम उनके प्रगतिशील नज़रिए से वाकिफ हो जायेंगे।

एक आदमी कितना सादे ढंग से आगे बढ़ता हुआ अपनों के बीच बेहतर मुकाम पाता है और लगातार ठीक विचारों के मित्रों के बीच अपनी उद्देश्यकेंद्रित यात्रा को अंजाम देता है, इसका अच्छा उदाहरण कुँअर रवीन्द्र है। यह शख्स अपने रेखाचित्रों और कभी-कभार अपनी कविताओं के गुच्छों की वजह से भी हमारे बीच विलग ढंग की उपस्थिति दर्ज कराता है। इस सारे माजरे में कुँअर  की कलात्मक अभिरुचि के मार्फ़त हम उनकी प्रतिबद्धता से परिचित होते हैं। उर्वर कल्पना के धनी रवींद्र अपने आत्मिक अंदाज़ के साथ मित्र के तौर पर एकदम मुफीद नज़र आते हैं। उनकी कविताओं से गुज़रना तात्कालिक मुद्दों और विमर्शों से मुखातिब होना है। साधारण बोलचाल की शब्दावली से कुँअर की कविता उनकी  विविधता में एक और रंग भरती है। रवींद्र अपने कलावादी नज़रिए के साथ एक ख़ास वैचारिक सूझ सहित खड़े नज़र आते हैं मगर किसी भी तरह का कट्टरपन वहाँ नदारद रहता है। इस तरह वे सभी नुक्कड़ों पर लगभग खरे उतरते हैं। यहाँ लिबरल रवैये के कारण रवींद्र को उस ढंग से केवल कलावादी कह देना भी नाइंसाफी हो जाएगी।

यहाँ साहित्यकार सूरज प्रकाश के शब्दों में कहें तो हम अगर फेसबुक को एक विशाल, निरंतर बड़ी होती और हर पल अपडेट होती ऐसी पत्रिका मानें  जिसमें रचनाकार तो बहुत हैं लेकिन संपादक कोई नहीं, व्यवस्थापक भी नाम मात्र का और पाठक भी उतने ही जितने रचनाकार तो फिर कौन संवारता है इतनी बड़ी पत्रिका और कौन कलापक्ष देखता है और रात-दिन चिंता करता है कि अच्छी रचनाएं भी अच्छे तरीके से पेश की जानी चाहिये ताकि उन पर सबसे पहले निगाह जाये। तो भई फेसबुक नाम की इस पत्रिका के कलापक्ष को बरसों से संभाले हुए हैं हमारे मित्र सखा और हर दिल अज़ीज़  कुँअर रवीन्द्र। उनके रंगों और सूझबूझ से फेसबुक पर आने वाले विभिन्न कवियों की कविताएँ और गहरे अर्थ देने लगती हैं। उनकी चित्रकला स्वतंत्र अपने आप में तो बहुत कुछ कहती ही है। वह यह काम बिना किसी स्वार्थ के कब से करते  चले आ रहे हैं। उनके रंग देर तक और दूर तक अपनी छाप छोड़ते चलें यही कामना है।
कुँअर रवीन्द्र के चित्रांकन में ऑइल वर्क का कमाल कई बारी हमें इतना आकर्षित करता है कि हम उनके काम में फोटोशॉप सरीखे सॉफ्टवेयर की आंशिक और तकनीकी मदद की संभावना जता देते हैं। खैर यह विषयांतर होना हो जाएगा। खासकर यहाँ यह कहना भी समीचीन होगा कि सुझाए गए विषय के अनुरूप ही कुँअर रवीन्द्र की वैचारिकी से उपजे सभी आयामों में वे खुलकर व्यक्त होते हैं। पेन्सिल स्केच से लेकर तेल चित्रों में उनकी समसामयिक सोच उन्हें ज़माने के अनुसार उपयोगी और एक ज़रूरी कलाकार साबित करती है। इन विचारों से यह भी साफ़ हो जाता है कि कुँअर रवीन्द्र इस दृश्य में मनुष्यता के पक्ष में सतत सृजनशील हैं। उनके सारे कदम मानवता को पोषते दिखाई पड़ते हैं। 

युवा लेखक पुखराज जाँगिड़ ने ई-पत्रिका अपनी माटी के लिए लिखे एक एक आलेख में लिखा है कि कुँअर रवीन्द्र के चित्रों का प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों ही रूपों में पक्षियों से उनके चित्रों का बड़ा गहरा रिश्ता है। उनकी रचनाएं पृथ्वी और चंद्रमा के मध्य पक्षियों की उपस्थिति दर्ज करती है। दूसरे शब्दों में कहूँ तो प्रकृतिजीविता उनके चित्रों की प्रारंभिक शर्त है। और शायद हमारे जीवन की भी। इसीलिए उनके चित्र बड़ी ही संजीदगी से हमारे समय की सामाजिक-उठापटक को हमारे सामने लाने में सफल हो पाए है। कुँवर रवींद्र के चित्रों की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता कलाओँ का अंतर्गुंफन और उनकी परस्पर अंतर्निर्भरता है। वैसे भी एक कलाकार के लिए प्रेम पाने और उंडेलने और बाँटने का सबसे सशक्त माध्यम उसकी कला ही होती है और इस मायने में कुँवर रवींद्र की चित्र-साधना कला में मनुष्यता की खोज के लिए जुझती रही है। यानी धुंधियाती पृथ्वी और खत्म होती मनुष्यता को बचाने का एक कलाकार का प्रयास। उनकी चित्रकला का प्रकृति प्रेम आकृष्ट करता है। यानी प्रकृति और मनुष्य का सहज साहचर्य उनकी कला को अधिक प्रभावी बनाता है। कुल मिलाकर कुँअर रवीन्द्र की कलाकृतियाँ प्रायः समानांतर रूप से दो विरोधी धाराओं को जोड़ने और अपनी अर्थबहुलता के लिए जानी जाती है।

कुँवर रवींद्र के व्यक्तित्व में सीधे तौर पर रीवा, भोपाल और रायपुर की बू आती है असल जीवन में इसी रास्ते से होकर उन्होंने कई चित्र प्रदर्शनियों और सम्मान समारोहों में पुरस्कृत होने के नज़ारे देखें हैं। उनके लगभग सभी कलारूपों में जीवन का सही आँकलन दिखाई देता है। संवेदना के स्तर पर रवींद्र भाई ने अपनी रचना प्रक्रिया में कईयों को पीछे छोड़ अपने किरदार को ठीक से निभाया है। रवींद्र भाई ने न केवल देहाती संस्कृति को आधार बनाया वरन प्रकृति के साथ पूरा तादाम्त्य स्थापित करते हुए अपने अनुभवजन्य विचार उकेरे है।

रावतभाटा, राजस्थान के विचारवान युवा चित्रकार रवि कुमार के शब्दों में मैं अपने किशोरवय से ही साहित्यिक पत्रिकाओं में जिनके रेखाचित्र देखता और प्रेरणा पाता रहा हूँ उनमें के. रवींद्र का भी नाम प्रमुखता से है। बाद में फेसबुक के जरिए उनके काम की विविधता और व्यापकता से परिचय हुआ। चटख़ रंगों के व्यतिरेक में रचे बसे उनके रंगीन कलाचित्र और बारीकियों से लबरेज उनके श्वेत-श्याम रेखांकन आम-जीवन की विभिन्न अभिव्यक्तियों को जिस आभा के साथ उभारते हैं, वह बहुत ही प्रभावशाली है। इन सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि आम जीवन की संघर्षशील धारा के साथ उनका सक्रिय जुड़ाव, पक्षधरता और प्रतिबद्धता कमाल की है, कलाकर्मियों के लिए प्रेरणास्पद है।

प्रखर टिप्पणीकार और कवि अशोक कुमार पाण्डेय ने तो यहाँ तक कहा है कि कुँअर रवीन्द्र सिंह मूलतः प्रकृति और मानवीय भावों के चित्रकार हैं। उनके यहाँ अक्सर बहुत गहरे रंगों का प्रयोग है जिसे मैं अपने तईं गहरे आत्मविश्वास के प्रतीक के रूप में लेता हूँ। कविताओं के साथ वह इन चित्रों के सहारे गहरे उतरते हैं और अक्सर उन्हें और मानीखेज़ बना देते हैं। लेकिन इन सबके ऊपर है उनकी सहजता जिसका फायदा हम दोस्त अक्सर उठाते रहते हैं। यह सहजता जितनी व्यवहार में हैं उससे कुछ कम कला में भी नहीं।
प्रतिभाशाली चित्रकार और विचारशील कवि कुँअर के सृजन से यह माहौल संतुलन की स्थिति में है।एक बेहतर आदमी होने की दिशा में बढ़ते हुए साधारण आदमी को सलाम और शुभकामनाएं।

(कुँअर रवीन्द्र, रायपुर-छत्तीसगढ़,संपर्क-09425522569)



माणिक उर्फ़ 'बसेड़ा वाले हिंदी के माड़साब'। 
सन 2000 से अध्यापकी। 2002 से स्पिक मैके आन्दोलन में सक्रीय स्वयंसेवा।2006 से 2017 तक ऑल इंडिया रेडियो,चित्तौड़गढ़ से अनौपचारिक जुड़ाव। 2009 में साहित्य और संस्कृति की ई-पत्रिका अपनी माटी की स्थापना। 2014 में 'चित्तौड़गढ़ फ़िल्म सोसायटी' की शुरुआत। 2014 में चित्तौड़गढ़ आर्ट फेस्टिवल की शुरुआत। चित्तौड़गढ़ में 'आरोहण' नामक समूह के मार्फ़त साहित्यिक-सामजिक गतिविधियों का आयोजन।'आपसदारी' नामक साझा संवाद मंच चित्तौड़गढ़ के संस्थापक सदस्य।'सन्डे लाइब्रेरी' नामक स्टार्ट अप की शुरुआत।'ओमीदयार' नमक अमेरिकी कम्पनी के इंटरनेशनल कोंफ्रेंस 'ON HAAT 201' में बेंगलुरु में बतौर पेनालिस्ट हिस्सेदारी।

कई राष्ट्रीय सांस्कृतिक महोत्सवों में प्रतिभागिता। अध्यापन के तौर पर हिंदी और इतिहास में स्नातकोत्तर। 'हिंदी दलित आत्मकथाओं में चित्रित सामाजिक मूल्य' विषय पर मोहन लाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर से शोधरत।

प्रकाशन: मधुमती, मंतव्य, कृति ओर, परिकथा, वंचित जनता, कौशिकी, संवदीया, रेतपथ और उम्मीद पत्रिका सहित विधान केसरी जैसे पत्र में कविताएँ प्रकाशित। कई आलेख छिटपुट जगह प्रकाशित।माणिकनामा के नाम से ब्लॉग लेखन। अब तक कोई किताब नहीं। सम्पर्क-चित्तौड़गढ़-312001, राजस्थान। मो-09460711896, ई-मेल manik@spicmacay.com

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