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02 जून, 2021

बसेड़ा की डायरी : अध्यापन मिशनरी जिम्मा है।

बसेड़ा की डायरी, 2 जून 2021
गहन चिंतन में कई बार साफ़ हो चुका है कि अध्यापन मिशनरी जिम्मा है। बच्चों के खेल की भाषा में कहूँ तो इसमें हमेशा डाम आता ही है किसी धरम-खुल्ली का लाभ नहीं मिलता। एकदम रिमोट एरिया के गाँव वालों के लिए माड़साब सभी तरह की बीमारियों का अचूक ईलाज मान लिए गए हैं। शादी-ब्याव के मुहूर्त ढूँढ़ने और टाबरों के नाम निकालने के लिए पञ्चांग देखने तक गुरूजी का आसरा रहता है। कौनसा अस्पताल ठीक रहेगा? और मौत-मरण की चिट्ठियाँ कहाँ छपवाएँ? जैसे प्रश्नों के उत्तर भी माड़साब को ही देने हैं। एक ही ठौर पर लम्बी नौकरी के बाद तो माड़साब बारात और मायरे में जाने के लिए तक बाध्य हैं। जानीवासे की व्यवस्था से लेकर डायचे की खरीद-फ़रोख्त तक में माड़साब की राय ली जाती है। छोरे-छोरी को बाहर कहाँ पढ़ने भेजें सरीखे मुश्किल मामलों से लेकर गाँव के अभिभावक भाई-बन्दों की पाँती-पूरी में भी माड़साब को बीच में रखते हैं। एक ज़माना था जब ‘खांड कितनी बोरी गलानी है?’ जैसे मुद्दों पर जात-बिरादरी के पंचों सहित गाँव के माड़साब से भी मशवरा किया जाता था। 

वक़्त ने तेज़ी से करवट ली है, यह सत्य है पर फिर भी माड़साब एक विश्वास का नाम रहा है। अब भी बारह दिन की शोक की जाजम पर स्कूल के अध्यापक बस्ती में जाते हैं और बुलावे पर मोसर भी गाहे-बगाहे जीम ही लेते हैं। वक़्त गुजरने के साथ माड़साब की यादों में भले कुछ दृश्य मिट जाएँ मगर चाय-पानी की मनुहार पर घर आए गुरुजी विद्यार्थी की स्मृति में स्थाई रूप से रहते हैं। बीते तीन दशक में अध्यापक-बिरादरी और शेष समाज का एक दूजे में विश्वास घटा है तो लगा कि दोनों पक्षों में संवेदनाएँ छीजती अनुभव हुई। ऐसी छीजत से दिल दुखता है। यह बहुत भला करने वाली स्थितियाँ नहीं कही जा सकती है। कोरोना-काल में अध्यापक-समूह देहाती समाज की देखभाल के बहाने फिर से जुड़ा है। स्मृतियाँ पुन: जाग उठी। रिश्तों में गर्माहट भर गयी। स्कूल को अहमियत मिली। यह गुरुजी के ‘गुरु’ हो जाने की तरफ वापसी मानी जाए तो गलत नहीं होगा।

कभी-कभार ऐसा घटित होता है कि अध्यापन-यात्रा में वर्तमान की उलझनों से उपजी परेशानियों को स्मृतियों का सहारा मिल जाता है। उदाहरण में देखें तो जैसे यादों में बालिकाएँ विद्यालय का आँगन ऐसे मन लगाकर लीप रही हैं जैसे उनका खुद का घर-गुवाड़ हो। बालक रंगोली बना रहे हैं। छोटे-छोटे बच्चे फुग्गे फुलाने में तल्लीन। छोटी बच्चियाँ फर्रियाँ लगाकर मंडप सजा रही है। स्कूल दुल्हन का घर हो गया। सातवीं वाले समूह गान का दोहराव कर रहे हैं और सोचते हैं कि मेहमानों के सामने बसेड़ा का नाक ऊँचा रहना चाहिए। पहली-दूसरी के बच्चों की खुशी सातवे आसमान पर है। आठवीं वाली तीन लडकियां द्वार पर सजधजकर थाली-कलश लेकर परदेश से आने वाले पामणों की बाट देख रही हैं। बड़े लड़के जनरेटर का इंतज़ाम कर रहे हैं। ग्यारहवीं ने बड़े जतन से बारहवीं वाले भाई-बहन के लिए टाइटल बनाएँ हैं। एक टोली कुछ माड़साब की देखरेख में जीमण की तैयारी में सुबह से व्यस्त है। कोई भी उमंग से बचा नहीं है। वातावरण में उत्सव छप गया है। साउंड सिस्टम वाला सूची के हिसाब से राजस्थानी-मांड सुना रहा है। नृत्य प्रस्तुत करने वाली बालिकाएँ घर से ही खुबसूरत पहरावणी के साथ झुमका-बिंदी और काजल-टिक्की लगाकर आई हैं। उस कमरे से बार-बार बाहर ताका-झाँकी कर रही हैं जहाँ उन्हें कंट्रोल करने के लिए स्कूल की बड़ी बैंजी पहले से तैनात हैं। बड़े सर आज फुल फॉर्म में हैं। नींद खुली तो पता चला यह स्वप्न था। 

स्मृतियों के चलचित्र। जी अधूरी इच्छाएँ स्वप्न जनती हैं। अचानक आए कोरोना ने हमसे बारहवीं की विदाई समारोह की रस्म जो छीन ली थी। हम लाचार और निरुपाय हाथबांधे खड़े रहे थे। क्या करते? बीते से बीते सालों की स्मृतियों से खुद को विश्वासते रहे। नाच-गान की उम्मीदों का सूरज देखते-देखते डूब गया। आशीष में खड़े हाथ वहीं के वहीं रह गए। विदाई में देने योग्य भाषण के नोट्स अधूरे ही पड़े रहे। ग्रुप फोटो की सारी योजनाएँ धरी रह गयी। ललाट कुमकुम तिलक के बगैर लौट गए। बारह बरस तक स्कूल को घर की तरह वापरते हुए प्रेम सींचने वाले बच्चे स्नेह से महरूम रह गए। सत्यानाश हो कोरोना का। इसकी जड़ें उपाड़ फैंकने का दिल करता है। इसके हलक में तेज़ाब उंडेलने का मन करता है। इसकी मुंडी काटकर गाँव में घुमाने का इरादा है। कोरोना तेरे कोढ़ में खाज उपजे। बवासीर सहित वे सभी लाइलाज बीमारियाँ तुझे घेर ले। बिना नुते के जीमने आया मेहमान तू। कितना बेशर्म ठहरा। न घराती न बराती। न चिट्ठी न पाती। नासपीटे-हत्यारे। जितना कहे उतना कम। को है जनक तेरो कौन है जननी। कौन गाँव को वासी। कौन सिखायो ऐसो पाठ, तू हमको दीनी फासी। 

बच्चों से ऑनलाइन संवाद के वाट्स एप माध्यम से आज कुछ प्रश्न पूछे। जैसे कोरोना काल में बच्चे इन दिनों घर पर कौनसे पांच काम में व्यस्त हैं। टीवी और मोबाइल पर वे क्या देखते हैं। कौनसे टीवी सीरियल पसंद हैं। घर का कौनसा काम कौन-कौन करता है। कौन-कौन चाहता है कि स्कूल कभी खुले ही नहीं। बच्चों को स्कूल के नाम पर सबसे अव्वल क्या ज्यादा याद आता है। घर पर आजकल कौनसे खेल खेलते हैं। घर में आप आजकल कितना बोलते हैं। घर वालों के लिए आप किस हद तक कितने मुसीबत हैं। कोरोना नामक बीमारी पर मन में पहला विचार क्या आता है। स्कूल उन्हें अब क्यों याद आता है। ऐसे ही प्रश्न भेजे। बमुश्किल पाँच जवाब मिले। एक बारगी तो इतने कम उत्तर निराश कर गए। नहीं जानता कि उधर क्या चल रहा है। हाँ पर जानना तो होगा।

आज रात ही राजस्थान सरकार के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जी के अनुसार छात्र-हित में निर्णय लिया गया और दसवीं-बारहवीं बोर्ड परीक्षा रद्द की गयी। अब कक्षा बारहवीं उत्तीर्ण ममता ने साझा किया कि इन दिनों रसोई के अलावा वह खेत में माँ-पिताजी के साथ मिट्टी डलवाने और कंकड़ बीनने में सहायक की भूमिका अदा करती है। लम्बी छुट्टियां नहीं सुहाती। सारे अध्यापक बेतरह याद आते हैं। कक्षा के दोस्त और मटरगस्ती यादों में सबसे ऊपर तैरती है। पढ़ने के नाम पर ई-कक्षा यूट्यूब चैनल का आभार जता रही थी। ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ टीवी सीरियल से मन हल्का हो जाता है। लगातार के काम से बोझिल जीवन में सहजता अनुभव होती है। कभी दिल हुआ तो ममता ‘लूडो’ और ‘चोंगे’ खेल लेती है। गाय-बछड़ों को पानी-सानी देकर मम्मी का हाथ बटाती है। इसी में ममता को सुकून मिलता है। आगे पूछने पर बताने लगी इस बार अवकाश में पानी-पूरी, दाल-बाफला, समोसे और आलू-बड़े बनाना सीखी। परिवार ने अपने लिए बाड़े में एक गाय पाल रखी है जिसका नाम ‘मीरा’ है और उसके बछड़े का ‘करण’। दोनों को घरभर का प्यार मिलता है। ममता को भैंस का बच्चा यानी पाडा पसंद है। उसका नाम बड़े लाड़ से ‘भालू’ रखा हुआ है। मैंने अपने आप को करेक्ट किया क्योंकि मुझे लगा बच्चों की दुनिया माता-पिता और भाई-बहन से भी आगे तक फ़ैली हुई है। 

स्कूल की फाटक की सीध में सुनीता का घर है। हमारी पूर्व विद्यार्थी ममता के तीन भाई-बहन स्कूल शिक्षा में पढ़ते हैं। उसने कुछ विवरण भेजा है। सुनीता बारहवीं में थी और तनुषा अब दसवीं में आई है। सबसे छुटका अर्जुन छठी का विद्यार्थी है। यह ओमप्रकाश जी मीणा का परिवार है। ओमजी हमारी विद्यालय प्रबंधन समिति के एक सदस्य हैं। जब कहो तब हाज़िर। हाँ तो सुनीता इन दिनों टीवी के नाम पर न्यूज चैनल को फोलो करती है क्योंकि अब प्रतियोगी परीक्षा एकदम सामने है। आत्मविश्वास मजबूत है मगर अभ्यास अभी शेष है। ऊपर से एक तो देहाती पिछड़ापन डराता है। दूजा तथ्य यह कि सुनीता को ‘कुल्फी कुमार बाजे वाला’ धारावाहिक भाता है। घर में कामकाज सभी मिलकर निबटाते हैं। ममता बड़की लड़की है तो मम्मी के साथ रसोई संभालती है। सुनीता के नामे बर्तन और तनुषा के नामे फ़र्श की सफ़ाई। तीनों बहनें हैं तो कभी-कभार की आपसी चिल्ला-चोट स्वाभाविक है। अर्जुन साइकिल पर रबड़ता रहता है। पापा से सभी थोड़ा-थोड़ा डरते हैं। पड़ौस में रानू और निकिता रहती हैं। वे भी घर में वे समस्त काम करती हैं जो समाज ने बालिकाओं के लिए नियत कर रखे हैं। मुझे इंतज़ार है उस इतिवार का जब तनुषा दिनभर साइकिल चलाएंगी और अर्जुन सप्ताह में एक बार पोछे लगाएगा। सुनीता हर सोमवार बैडमिंटन खेलेगी और अर्जुन अपने कपड़े खुद धोना सीखेगा। जब तक बेटे राजकुमार कहलाएंगे और बेटियाँ राजकुमारी तब तक हालात सुधरने मुश्किल है।

गुणवंत ने मोहल्ले का हाल साझा किया कि माँ चूल्हा-चौका संभालती हैं। सामान्यतया पानी भरने में घर के लड़के मदद करने लगे हैं। कई घरों से टीवी गायब है। पिताजी की उम्र के पुरुष बावण और बीजवारे के फेर में ही पड़े रहते हैं। बहनें माँ की सहायता करने के लिए बनी हैं। काम से जी चुराने वाले स्कूल खुलने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं। दिन काटना मुश्किल काम होता जा रहा है। मोबाइल में ‘फ्री’ फायर’ गेम नहीं होता तो मामला और भी संकट में ही था। बाकी ‘इन्स्टाग्राम रील’ जिंदाबाद। गुणवंत आगे बताता है कि बच्चे कभी घरवालों के लिए मुसीबत नहीं होते सर। रौनक बनी रहती है। बीमारी से जुड़ी चर्चाओं में सरकारों को लताड़ना आम हो गया है। मौज-आनंद और आईसीटी वाली क्लास में देखी अनूठी फिल्मों के लिए स्कूल बड़ा याद आता है। अंत में गुणवंत ने कहा कि सफ़र में कभी-कभी वैचारिक खालीपन की अवस्था अच्छी नहीं होती। निराश और उचाट मन को अध्यापकों से होने वाली छोटी सी भेंट या कोई क़िताब बचा लेती है। बड़े नुकसान को भोगना हमारे बस का नहीं।  

दिनभर में दो अध्यापकों से बात करता हूँ। अपनी सुनाता और उनकी सुनता हूँ। आज सुबह करजू छोटी सादड़ी के पास किसी गाँव में रहने वाले भाई शान्ति लाल से लम्बी बात हुई। वह एसटीसी में मेरा अनुज था। शाम के वक़्त पैराटीचर आन्दोलन के साथी बिनोता निवासी भाई अभिषेक भारद्वाज से देर तक समग्रता में बातें हुई। विस्तार से फिर कभी लिखूंगा।  
डॉ. माणिक(बसेड़ा वाले हिन्दी के माड़साब)

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