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28 अगस्त, 2011

साफ़ हो गए सारे आँगन

चित्तौड़ का किला देखने के लिहाज़ से आई बाहरी टीम पर मेरी सध्य विचारित कविता
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कहाँ मिलेगी ऐसी बस्ती
मिले कहाँ फिर जंगल
हरेभरे मृगवन को साधे
किला है अपना भरा-भरा

युनेस्किया चश्मे से देख्नेगे
लोग दूर के करेंगे भ्रमण
कुछ तुम उलजाना बातों में
हम ढँक लेंगे अतिक्रमण

साफ़ हो गए सारे आँगन
सारे झरोखे अब धुले हुए
खिड़कियाँ सारी जाड़ी-पोंछी
सारे बल्ब-ट्यूब अब जले हुए

लीद बुहारी और धोए आँगन
लिपे-पोते बोर्ड पुरातन आज
कचरा-पात्र उग आए हर ओर
अचानक सूअर-गाएं गायब

सारी सुरंगे आज खोलकर
आँखें फाड़ सब राह निहारे
सारे अफसर सारे हाकम
जों दरवाजों पर बान्दनवारें

---लगातार  

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