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28 दिसंबर, 2011

28-12-11

जीवन में कई बार लगा कि बिन गुटली का पका हुआ आम मिल गया और कई बार चारों तरफ से चौड़ेधाड़े आक्रमण करती मुसीबतें हमें जीवन को समेकित रूप से एक भांत का छातीकुटा करार देने को प्रेरित करती नज़र आई .इस समय पर मेरी दो टूक...................सरकारी मास्टर की नौकरी,सर्दी की छुट्टियां,शहर की बेवज़ह और तथाकथित व्यस्त ज़िंदगी,गाँव में बेटे के गाँव आने की बाट में दिन काटते माँ-बाप, नित-नूतन बहाने बनाकर अपने जन्मदाता को अलग-अलग बहाने परोसता बेटा जब किंकर्तव्यविमूढ़ बन फंसा हुआ होता है तब ये जीवन उसे छातीकुटा लगता है.

मुझे शिक्षक बनाने का जुगाड़ पैदा करने वाली उस ट्रेनिंग के दिनों के मित्रों यानिकी बोले तो छोटे-बड़े भाईयों के साथ हाल के दो दिन गुज़रे.फुर ....र.....र.....र..... से........... मित्र जो जानकर भी मेरी तरक्की के बारे में मुझसे कुछ नहीं पूछते,तमाम तरह का गालिगलोच,खुले में निषेध के सभी अपेक्षित विषयों पर लम्बी बातें हुई,जो सदैव मित्रों के साथ संगत की ही बाट जोहती दिखाई दी.

मित्र हां वही मित्र .............अन्तरंग मित्र जब मिल बैठते हैं तो समस्त वर्जनाएं ताक में रह जाती है.नियम क़ानून लांघे जाना नई बात नहीं होती है.हमारी हर आदत से वे मित्र वाकिफ होते हैं.जिनके आगे हमारी होशियारी काम करना बंद कर देती है.यूं मित्रों के साथ रहते हुए माँ-पिताजी से झूठ बोलता हुआ बेहयाई के संग दो दिन काट गया.निचौड़ यही कि एक साथ मैंने आम भी खाए और छातीकुटा भी जी लिया.दोनों क्रियाएं समान्तर ........एक में आनंद है दूजे में माथापच्ची.चाहकर भी गाँव ना जा पाना कैसा संकट है.कैसी अधरझूल ज़िंदगी है.

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