Loading...
30 दिसंबर, 2011

मैं अवेरता हूँ पत्थर


मैं अवेरता हूँ पत्थर

खस्ताहाल महल देख तुम
चकित न होना पलभर
सारी यादें ताजा करते
यहीं ठिकाने भामाशाह के
आँख फाड़ फाड़ क्या हो देखते
जो बिखरा है वही सचाई
नहीं भ्रम ये भारी
अरसे से लिखा है
यही है फितरत इनकी  
कुछ टेड़े मेड़े पत्थर ही
इतिहास हुआ करते हैं
मेरी तेरी राह अलग है
मीरा ढूंढो तुम यहाँ किले में
मैं अवेरता हूँ पत्थर तबतक

0 comments:

टिप्पणी पोस्ट करें

 
TOP