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20 जनवरी, 2012

20-01-12

उन्नीस सौ निन्यानवे की बात है जब मैं डाइट नामक संस्थान की चित्तौड़ शाखा से एस.टी.सी. जैसा डिप्लोमा पूरा कर निबटा.जो सोचा सो तो नहीं हुआ अक्सर नहीं होने की तरह.आठ साल बाद सरकारी नौकरी मिली.इन दो तीन दिन से फिर से उसी आँगन में तथाकथित एक सरकारी प्रशिक्षण के खातिर यादों में खोया हूँ.बिना नॉस्टेलजिक  हुए साफ़ बात कि तब हम अतिरिक्त अनुशासनप्रिय थे,अपने गुरुओं के दबाव में नंबर के गणित में उलझे हुए थे. हालांकि नम्बर बाद के सालों में कभी काम ही नहीं आए..तब के किए मूर्खतापूर्ण कार्य आज फिर याद आ रहे हैं.काम के नाम पर केवल एक नीम खड़ा है कौने में .उसके बड़े आकार को देख जीती जागती सबुरी है मन में.

यहीं से निकलने वाली वार्षिक पत्रिका हेतु मेरी एक सध्याप्रसुत कविता संपादिका को देने गया,उन्होंने मुझे बड़े भोले अंदाज़ में पूछा कि ''कविता स्वरचित है या कि से कहीं मारी है?''. वो पल मेरे लिए बड़े विकट थे.मैं मन ही मन हंसा भी,ठिठका भी,पर बोला मेडम निन्यानवे के साल को आज बाहरवाँ बरस है.इस बीच,दौर के साथ मैंने कई जगहों के गोते खाए,बना,बिगड़ा,पढ़ा,गड़ा मगर आप नहीं बदले.हम समय के साथ नहीं बदले तो कविता चोर ही समझे जाएँगे उसी निन्यानवे के साल की तरह.

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