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20 फ़रवरी, 2012

20-02-2012

आज महाशिवरात्रि होने के अतिरिक्त उत्साह के बजाय मेरे मन में उपजा उत्साह और उमंग मेरे पुराने दोस्त प्रवीण और जीतेन्द्र के चित्तौड़ आने की खुशी के कारण है.वैसे भी मुझ जैसे नास्तिक के हित भगवान् शिव से ज्यादा उनके शिवालय का वास्तु,आज के आदमियों द्वारा की गयी उन्ही  मंदिरों की साज-सज्जा मायने रखती है.मैं मंदिर भी जाता रहा हूँ. मगर आज लोगों की धारा के विरुद्ध आँखें खुली रख कर दर्शन करता हूँ,क्या पता कब दर्शन हो जाए.हालांकि ये बात भी मेरे जहाँ में है कि मुझ्जे कभे दर्शन नहीं होंगे क्योंकि मैं कोइ बहुत बड़ा साधू संत नहीं हूँ.न मैंने कोइ बड़ी तपाया की है.पत्नी के संग आंशिक मात्रा में सांस ले रही मेरी आस्तिकता से मेरे घर में एक समन्वय रहता है.दूजी तरफ नास्तिकता के चलते मेरे विचार खुले में सांस लेते हैं.उसी भान्त का पठन/लेखन जारी है.आज हम तीन दोस्त उसी चित्तौड़ दुर्ग में घूमने की योजना बनाए बैठे हैं जहां सर्वाधिक मात्रा में शिवालय है.मगर आज हम शिवालय के बगैर कुछ और अनजान जगहों पर जायेंगे जो अब तक हमारी नज़र से अछूती ही है.

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