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27 फ़रवरी, 2012

कविता-अधूरी कवितायेँ

अधूरी कवितायेँ 


अलिखी,अधलिखी
घुम चुकी,उड़ चुकी
कवितायेँ बहुत सारी
लौटा दी गयी
फिर से मुझ तक आई
ऐसी तमाम रचनाएं
कहलाई अधूरी कवितायेँ

अटकी रही मन में और
गले तक आ लौट गयी
ढ़लते-ढ़लते फूट गयी
कुछ आखिर में रूठ गयी
आ न सकी कागज़ पर
ऐसी तमाम रचनाएं
कहलाई अधूरी कवितायेँ


कभी झुकी नहीं अब तक
न कसीदे पढ़ने के काम आई
न चिकनी-चुपड़ी बतियाने
आज के दौर से विलग
बिलकुल अलग शक्लों की
सारे सम्मानों को चिढ़ाती
ऐसी तमाम रचनाएं
कहलाई अधूरी कवितायेँ

जो छपी नहीं तथाकथित
नामचीन लघु पत्रिकाओं में
छुपी रही बचाते हुए खुद को
पकती रही कंदराओं में
रसीली होकर भी कड़वी
करार दे दी गयी
तमाम हथकंडों  की शिकार
ऐसी तमाम रचनाएं
कहलाई अधूरी कवितायेँ

जिन्हें सुना नहीं गया
तल्लीनता से जिन्हें
नहीं मिली तालियाँ
प्रायोजित श्रोताओं की
'वाह' न मिल सकी समय रहते
अतुकांत और अकविता नाम
से बदनाम हुई गोष्ठियों में
ऐसी तमाम रचनाएं
कहलाई अधूरी कवितायेँ

प्रेम,प्रकृति और सौन्दर्य
से कोसों दूर
भूख,आक्रोश,वेदना
और सच सहित
भरापूरा कथ्य था जिनका
झुठला दी गयी समय का सच उघाड़ती
ऐसी तमाम रचनाएं
कहलाई अधूरी कवितायेँ

(नोट:-इन रचनाओं का उपयोग करने से पहले माणिक की अनुमति ज़रूरी होगी.कृपया सूचित करिएगा.)

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