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01 अप्रैल, 2012

01-04-2012

बीते कुछ दिन फर्राटे से गुज़र गए.और मैं पैदल चाल सी साँसे लेता रहा.लिखने लायक कुछ घटा नहीं.मगर देखने और सोचने लायक बहुत कुछ घट गया.एक अधिकारी इस हद तक जा सकता है जाना,एक साथी कर्मचारी किस हद तक परेशान हो सकता है,बाकी साथी किस हद तक डूब कर निंदा रसपान कर सकते हैं.कोई दूर का साथी कैसे बेहिचक लाखों की सहायता की हामी भर देता है.खरीद-फरोख्त के मुआमलों में कैसे अपने पहले के परिचित इस ओर झुके रहते हैं.मूंह से निकला एक निराशावादी वाक्य भी किसी आदमी को किस हद तक घुप्प अन्धेरा ईनाम दे सकता,महज लड़की होने के कितने फायदे हो सकते हैं ओर लड़के होने के सारे नुकसान,बीते दिनों के अनुभव से जाने हैं.इन सभी के साथ ही जी-हजुरी के आवरण के बूते काल-कोठरी में जाकर भी बचे रहकर बाहर निकलते मित्रों की आदतें ढ़ेर अक्कल  दे गयी.ये तमाम अनुभव बीते दिनों के हैं जहां बोलने की गुंजाईश कम सोचने की ज्यादा थी.

नए पैरे से दूजी बात कहना चाहता हूँ कि स्कूल परिसर में एक गंडक मर गया.एक दिन पहले मरे गंडक की बास से पूरा आँगन गंधाता रहा.गाँव में पूछने पर पता चला ऐसे जानवरों को उठाकर/खींचकर फैंकने वाली जाति इस गाँव में नहीं रहती.मामला गंभीर होने के साथ एक अहसास का भी था.पहली में पढ़ती एक बालिका के घर वाले स्कूल के पिछवाड़े ही रहते थे.वे किस जात के थे मालुम नहीं मगर कह रहे थे कि हम गाँव में मरी गाय,भैंस,बकरी,भेड़ को गाँव के बाहर छोड़ने का काम करते हैं.गंडक के लिए हम नहीं हैं.वे गाय/भैस के चमड़े को काटकर उसके जूते/चड़स  आदि बनाते या चमड़ा बेचने वाले लोग थे.उनके हित गंडक का चमड़ा नकारा था शायद.कहानी ख़तम.आखिर में मरा गंडक स्कूल के सभी बच्चों ओर गुरूजी ने गाँव के बाहर फैंक महज एक मेहनताना नहीं बचाया जो उस परगाँव के जाति विशेष के साथी को बुलाए जाने पे दिया जाना था.



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