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27 जून, 2012

27-06-2012

दो दिन पहले शहर के टॉकीज में सालों बाद कोई फिल्म देखने के मन से गया। चंद्रलोक सिनेमा के ठीक बाहर गाड़ी रोकी।मेरे साथ पत्नी और बेटी अनुष्का भी थी।गेटमेन  ने आश्चर्य से देखा। ''गज़ब का दिलेर दर्शक है 'गेंगस ऑफ़ वासेपुर' जैसी फिल्म विथ फेमिली देखने आ गया।''.

शायद यही कुछ मन में सोच रहा था कि  मैंने दीवार पर 'हेट  स्टोरी' फिल्म के पोस्टर चिपके देख पूछा ये गेंगस ऑफ़ वासेपुर फिल्म उतर गयी क्या ?,वो बोला 

''आज आख़िरी दिन है।बस यही आख़िरी दो शो. हमारे सेठ जी बहुत जानकार और समझदार है ऐसी 'एनासिन ' फिल्म का लाईसेंस केवल चार दिन के लिए ही लाये। कुछ ढंग से कलेक्शन नहीं हुआ . ये देखो।बाईक स्टेंड पर चार बाईक ही खड़ी  है। अंदाज़ लगा लो कितने आदमी अभी शो में हैं।भैया अकेले देखने की फिल्म है।आदमी का भेजा खराब करने के लिए काफी है''

ये तमाम बातें और संवाद मेरे मन की उपज नहीं उस गेट कीपर की समीक्षा है जो रोज शो देखता और सोचता है।एक बारी लगा कि  हमने ऐसे आम आदमी के व्यू भी जानने चाहिए।खैर मैं फिल्म देखे बगैर आ गया।लगा शायद ये फिल्म कुछ नए ढंग से बनी हो मगर इसके दर्शक परिवार में एक साथ नहीं देख सकते. उन्हें एक एक कर देखने जाना पड़ेगा वो भी एक दूजे को बिना बताये।जैसे कई बार लोग छुपके  के इंटरनेट पर गूंगी फ़िल्में देखते हैं।

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