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08 जुलाई, 2012

07-07-2012

ढंग की एक बारिश के बाद ही गंभीरी के किनारे अस्थायी डेरों में रह रहे आदिवासी अपने देश चले गए।मतलब ,पीपलखूंट, प्रतापगढ़, घाटोल, धरियावाद, की तरफ। इसी तरह शहर भी अपने तयशुदा फोर्मेट में सांस लेता हैं जहां अब तक गर्मी की दुहाई देने वाले स्कूली उम्र के बच्चे कल अपनी तथाकथित नामी पाठशालाओं में जाने के लिए बस्ता जमा रहे हैं।तय योजना के मुताबिक़ चेंज होने वाली समय सारणी में ढलने को माँ -पिताजी तैयार हैं।नोट करें कि  यहाँ दादा दादी की शैली में कोई फेरबदल नहीं होगा.क्योंकि वे संयुक्त परिवार प्रथा के टूटने के साथ ही अपने टूट चुके रिश्तों के साथ पौत्र -पौत्री से दूर रहते हैं।अफसोस।.

खैर।.

आलिशान मकानों के बनने की प्रक्रिया में अब तक बने ईंट लेवल वाले ताबूतों में रातें गुजारने वाले तमाम आदिवासी अब कुछ महीनों बाद फिर आयेंगे।एक भी सामान उन खुले मैदानों में छोड़े बिना अपने खाद के खाली कट्टों सहित कनस्तर के पीपों वाली पेटियों में भर सामान आखिर वे चले गए।चुपचाप गायब हो गए।.आये भी चुपचाप थे।मजबूरी के मारे।अनजाने दोस्तों की तरह मुझे बहुत याद आयेंगे।तीन रंगी कपड़ों में ढंके वे लोग।बहुत कम कपड़ों में काम चलाऊ जीवन के संगीसाथी,हर उम्र की वेरायटी वाले।अक्सर शांत।अपनी ही बोली में खिलखिलाते-चहकते वे तमाम जोड़े।फिर आयेंगे इसी शहर में खपने को चुपचाप,मगर दूजी शक्लों के साथ।उन दिनों का मुझे भी बेसबर इंतज़ार है ठीक उसी तरह जैसे बच्चों के हित गर्मियों की छुट्टियों का आनंद आता है। 

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