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07 जुलाई, 2012

क्षणिकाएं -3

( 'पत्नी' सिरीज़ की कुछ क्षणिकाएं )


(1)
मैं थक हार के भी 
नहीं बन सकता था
उसके मानिंद
सामर्थ्य कहाँ था
मुझमें
इस हद तक
खुद को भूल
औरों में खोने का
वो भी तब
जब
इस दोगले दौर
वो निभा रही थी 
आखिर एक औरत
की भूमिका

(2)
शहर के नामचीन
बगीचे में
झुलती हुयी अर्धांगिनी
अचानक उम्र में
बहुत छोटी हो जाती है
मुझसे

अपने ही हाल खिलखिलाती
हुयी वो संजा गीत
गुनगुनाती
बहुत प्यारी लगती है
ट्रेन से दूजे शहर जाती
हाथों से
रिपसती प्रेमिका सी
रह रहकर
फुसफुसाती है

कई अनकही बातें
जो औपचारिकता में
कह न सकी अब तक मुझको

(3)
जब मैं गप्प लड़ाने
होता हूँ दोस्तों के बीच
वो गेंहू बीनती है
घर के हित
पिसाने को आटा और
पोने को रोटियाँ
सोचती हुयी
घड़ी भर सुस्ताती है
दुपहरों में कभी कभी ही

जब मैं
इंटरनेट पर देख रहा होता हूँ
फेसबुकी शगल के नज़ारे
या कि फिर गूंगी फ़िल्में
रातों में चुपचाप
वो थक-हार
सो जाती है
सुबह की योजनाएं
बनाती-बनाती

(4)
मेरा मंझन-दातुन,
दाड़ी  बनाना
सिर्फ मेरा भला करता है
निपटना-नहाना-संवरना
तमाम क्रियाएं
मेरे फायदे के हित पूरी होती है

इसके सर्वथा उलट
उसका
उठना और फिर
झाड़ू-चोका-बर्तन
चाय-नास्ते के फरमानों के बीच
लगातार घिसते जाना
सबके हित खपते जाना
उसका
बिना कहे चुपचाप
जानता हूँ कहीं नहीं लिखा जाएगा
उसका अवदान
इस पुरुष प्रधान समाज में
 
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