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06 जुलाई, 2012

06-07-2012

बीते दिनों का बहुत कुछ हिस्सा जब यादगार हो चले तो आगे के कुछ दिन ढंग के सपने संजोने में ही कट जाते हैं।वक़्त की रेल में मनमाफिक डिब्बा मिलना और हमविचार हमराही मिलना वाकई  दुर्लभ संगत हैं।काश सफ़र ऐसे कट जाता।इस 'काश' के इर्द-गिर्द ही हमारी तमन्नाएं दम दोड़ती हुयी दिखती हैं।और इसी के आसपास कोंपलों से खिलती हुयी आशाएं। बिना आवाज़ किये चलने वाली साईकल किसे नहीं भाती।मगर वक़्त ने तो हमारे हिस्से ही खटारा साईकल लिखी है।कभी घंटी खराब,कभी चेन उतर जाती,ब्रेक ढीले पड़  जाते,बाकी सब ठीक रहा तो ट्यूब से हवा छनकर निकल जाती और हम बार बार के पंक्चर में उलझे रहते हुए जीवन के टायर में गेटर रख गाड़ी हांकते रहते हैं। इसी चाल से चलते हमारे जीवन से बिना कुछ कहे रूठे हुए साथियों की तरह खफा दिन/पल/अवसर चुपचाप दूजा रास्ता नाप लेते हैं

पांच जुलाई की शाम चार बजे अचानक आकाशवाणी वाले योगेश सर का फोन मिला।दस मिनट में मीरा होटल।अगले पांच मिनट में पहली मंझिल लिफ्ट से सफ़र तय कर कमरा नंबर 208 में।बातों में खोये चार आदमी।.योगेश जी कानवा,चिमनाराम जी बाकी दो कम पहचाने मगर मुस्काराने के लिए मुफीद चहरे।एक किसी नामी रेडियो स्टेशन के प्रोग्राम ऑफिसर मीणा जी.चौथे शख्स जिनसे मिलते ही बातों की बाड़ आ गयी।.वे थे आकाशवाणी जयपुर के निदेशक हरीश करमचंदानी।एक तरफ योगेश जी ने मेरी तारीफ़ की चार पंक्तियों के साथ परिचय दिया।उसी पल हरीश जी ने फेसबुकी बातें शुरू कर मुझे अचानक मिले बहुत अज़ीज़ मित्र की तरह सराहा .इस माज़रे को चिमनाराम जी समझ नहीं पाए।वे नए सिरे से मुझे बखानने लगे कि  माणिक  लिखते-पढ़ते युवा हैं।तभी हरीश जी ने अपनी माटी वेब पत्रिका का ज़िक्र कर तारीफें शुरू कर दी.खैर हमें अपनी औकात पता थी,इसलिए कोई ख़तरा नहीं।कोई दूजा होता तो शायद फुल के कुप्पा हो जाता।मैं अनुशासित युवा की तरह चुपचाप था।यहाँ मैं एक बार का शुक्रिया अदा कर दूं कि हमारे अपनी माटी वेब पत्रिका परिवार में सम्पादन मंडल के सलाहकारों के ओहदे ही कई बार हमारी लाज बचाने और इज्ज़त बढ़ाने  के काम आते  हैं।.

एक दो फोन-फान के बाद ही मैं,हरीश जी कार में बैठ हमारे प्रिय कवि और गुरुवर .डॉ.सत्यनारायण व्यास के घर की तरफ के रास्ते पर थे।व्यास जी का परिचय हरीश जी से जयपुर में कभी विजेंद्र जी आदि के साथियों द्वारा करवाए गए कविता शिविर करके आयोजन से ही था।शाम छ: से सात तक बहुत सी बातें छानी .प्रेमिका की रसघोलू  बातों से भी ज्यादा चाव से मैंने उन दो महानुभावों की बतकही सूनी।साथ में श्रीमती चंद्रकांता व्यास जी (मम्मीजी) के हाथ की बनायी फीकी कोफी का मीठापन।लोक रचनाओं की दो किताबें टेबल पर रखी देख चर्चा शुरू हुयी जो बिना रुके बहुत से टेशन पार गयी।कभी व्यास जी अपने जीवन मूल्यों की चर्चा करते कभी हरीश जी अपने साथी मोहन श्रोत्रिय,दुरगा प्रसाद अग्रवाल,नन्द भरद्वाज और वेदव्यास के किस्से सुनाते।इसी बीच के बड़े कवियों की बातें हुए।.सबसे ज्यादा बार की रेटिंग मुक्तिबोध,कबीर और नागार्जुन के नाम रही.दोनों ने राहुल सान्क्रत्यायन  की जमकर तारीफ़ की।वहीं व्यास जी ने रवीन्द्रनाथ ठाकुर के द्वारा उनके साथ के लोगों के साथ बरताव के दिलचस्प किस्से भी.उनकी टिप्पणियों में अज्ञेय और ठाकुर की शाही अंदाज़ वाली जीवन शैली और ज़मीन की कविता भी निशाने पर रही।

इसी बीच नगर की एक संस्था के करता/धरता  सत्यनारायण समदानी आ गए।.मीरायन नाम की शोध पत्रिका का नवीनतम अंक हाथ लिए।व्यास जी के परम मित्र।कोलेज के साथी।दूजे बुजुर्गों की तरह डायबिटीज़ के मरीज़।बकौल व्यास जी युवाओं की तरह बहुत भागादौड़ी करते समदानी में गज़ब की हिम्मत हैं कि पैसों का जुगाड़ कर वे मीरायन चलाते रहे हैं।अर्थशास्त्र के होते हुए भी उनकी साहित्य में घुसपैठ दमदार हैं।कभी प्रबंध सम्पादक रहे समदानी अब मीरायन के सम्पादक हैं।वे उसी क्षण उठ चल दिए जब मैंने और व्यास जी  ने हरीश जी को उनके कद और असल पहचान के मुताबिक़ अपनी कुछ कवितायें सुनाने को कहा।खैर समदानी जी के जाते ही हमारी बैठक का आनंद फिर से प्रवाह पकड़ गया।मगर आना भी सार्थक रहा।हम तीन कामरेडों के बीच एक दूजी विचारधारा के साथी के रूप में कुछ देर का विमर्श।

हरीश जी जैसा बड़ा अधिकारी इतने सहज रूप में मैंने पहले कभी नहीं देखा.विचारों में कुछ हद तक लिबरल।.बाकी जितना मैंने जाना झुकाव के तौर पर कामरेड थे।मौखिक रूप से उन्होंने तीन चार छोटी कवितायेँ सुनायी ही थी हमारे ड्राईवर ने होर्न दे मारा।कई चुटीली बातों के संग गुज़री वो शाम बहुत याद .आयेगी ठीक उसी तरह जैसे हमने बातों के बीच खत्म की थी बीयर की बोतल कभी शादी के पहले।वैसे भी इतनी इत्मीनान और फुरसत अब वैवाहिक जीवन में मिलना कहाँ संभव हैं सच कहलाओ तो इस दिन हमारी कई सारी मिन्नतें पूरी होने के बराबर समय हो चला हो मानो ।

रात आठ बजे से जिंक के गेस्ट हाउस में एक के बाद एक मैं,,...ज़ी.एन.एस.चौहान फिर बाद में सत्येन्द्रनाथ मौड़ और आखिर में घनश्याम सिंह जी राणावत आये।बड़े इंतज़ार के बाद मानो रास्ता डुल गयी और अंत में ठिकाने पऊंचने वाली बरात के स्वागत में हम दरवाजे पर थे।डिनर के बहाने इस रात उदयपुर वाले माणिक  जी आर्य, जोधपुर वाले हमारे अज़ीज़ सुधीर जी राखेचा ,कोटा से आये एन.आर.मीणा  जी,जैसलमेर के साथी महेंद्र लालस बस इन्हीं मेरी पहले की पहचान के लोगों से मिल दिल खुश हुआ.बहुत से नए चेहरों से परिचित हो अपने आकाशवाणी परिवार को अब मैं बड़ा मानने लगा हूँ .यहीं हुयी एक अनौपचारिक बैठक का संचालन किया। ऐसे आलम के बीच हम तमाम सृजनधर्मियों के साथ कुछ घटनाएं ऐसी घटती है कि घर से फोन आते ही हमारी अर्धांगिनियों की एकाएक और अबतक की सुरीली आवाज़ भड़कीली हो उठती है। इस आवाज़ के बदल जाने के साथ ही हमारे तमाम विचार पलटियां खाने लगते हैं।अफसोस हमें इसी माहौल में जीना भी है और सक्रीय भी रहना है।. 

1 comments:

  1. जीवंत वृत्तांत! मज़ा आ गया. सोने पर सुहागा यह कि चितौड़ की धरती पर मित्रों की बातचीत में मेरा भी ज़िक्र आ गया. हरीश जी जैसे सहज और सहृदय मित्र मिलना वाकई बहुत बड़े सौभाग्य की बात है.

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