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13 जुलाई, 2012

13-07-2012


दोस्तों के बीचके मस्तीके आलममें अचानककभी कुछमहीनों पहलेकिये आवेदनकी कोर्सवाली किताबेंकोरियर वालादे जाएतो सारामामला चिंताजनकहो पड़ताहै।काम कीलम्बी सूचिमें येपढ़ने कासांग औरशामिल होजाता है।

थोड़ी सी व्यस्तताचल रहीहै.स्कूलअभी खुलेही हैं.आकाशवाणी मेंजाना आनारहता है.स्पिक मैकेकी कुछअनौपचारिक जिम्मेदारियां भी रहती हैं. .विचार चलतेरहते हैं.मगर उन्हेंकागज़ आदिपर उतारपाना फिलहालसभव नहींहो पारहा.आजही कुंवररवींद्र कीभेजी 'कलके लिए' का अदमगोंडवी अंकमिला है.मेरी पसंदके कवि.कुछ समयइस अंकपर गुजारुंगा

मैंने इस महीनेसे अपनेसारे ब्लॉगपर एकटेग लाइनलगा दीहै 'कहींभी नहींछपने लायकसामग्री यहाँमिलेगी'. मतलबमुझे अहसासहो गयाहै किमैं किसीप्रिंट पत्रिकामें छपनेलायक नहींहुआ.अच्छाहुआ येगलतफहमी जल्दीदूर होगयी.'आत्मज्ञान' जितना जल्दीहो उतनाही अच्छा.कहीं छपनेभेजने केसोगन लेलिए हैं.बाकी आनंद

आज की शामबहुत दिनोंया योंकह लीजिएगासालभर बादशहनाई सुनी.उस्ताद बिस्मिल्लाहखान बहुतयाद आये.मुझे जहांतक यादपड़ता हैखान साहेबको दोतीन बारसजीव कोंसर्टमें सुननेके बादएकाध बारकभी संजीव-अश्विनी शंकरजी जैसेचमकदार औरपरिश्रमी युवाओंको सुनाथा. बाकीकान शहनाईको तरसतेही रहे.हाँ आकाशवाणीमें भीअपनी ड्यूटीके बहानेबजाते रहेहैं.मगरवहाँ बाकीकामों कीफेहरिस्त मेंढंग सेसुनना संभवनहीं होसका.

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