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29 जुलाई, 2012

29-07-2012

हमारे चित्तौड़ में लोकप्रिय कवि की श्रेणी में जो नाम शामिल हो सकते हैं उनमें एक अब्दुल जब्बार जी का है। वे अपने अति उत्साह के कारण पिछले दो माह से एक नए बेनर तले जिसका नाम अमन फाउन्डेशन जैसा कुछ है। गोष्ठी आयोजन में उलझे हैं। महीने के आख़िरी रविवार को शाम के समय एक सेवानिवृत साथी रामेश्वर पांड्या जी के होटल पर कविता गोष्ठी होती है। ये जगह चंद्रलोक सिनेमा के ठीक सामने कौने में है। पहले आयोजन का संचालन मैंने किया। दूजे में मुझे बुलाना भूल गए। तीजा आज रात आठ बजे है। इस साठ पार उम्र में वे बुलाये और मैं जाऊं नहीं गुस्ताखी होगी। ये अलग बात है वहाँ कविवर लगभग वही रचना सुनाते है जो वे सालों से परोस रहे हैं। मैं एक नयी कविता के साथ कवि होने के भ्रम को घर छोड़कर गोष्ठी में जाने की कोशिश करता रहा हूँ। इस काम में अब तक तो सफल ही रहा। खैर, सभी खर्चा मित्र ही आपस में उठा लेते हैं। ये सहूलियत रहती है कि पैसे के कारण किसी अतिथि की तोका-तोकी नहीं करनी पड़ती।

पूरा अनौपचारिक माहौल। मेरी कोशिश रहेगी कि लफ्फाजी कम कर,कविता पर बात हो। सभी मेरे से उम्र में बढे साथी शामिल होते हैं। शहर में रचनाकारों की जमात को एक जाजम पर बिठाने के एक नए ठिकाने के रूप में मैं इसे बहुत अच्छा कदम मानता हूँ।पांड्या जी की तरफ से नि:शुल्क मिली इस होटल के तीसरी मंझिल के एक संकडे हॉल में बैठना,कविता सुनाना और बतियाना एक दिन संस्मरण की विषय वास्तु बनेगा,ऐसा मेरा मानना है। कभी लगता है कि  कविता के बहाने हम अपने मित्रों की शक्लों की टोह तो ले ही सकते हैं।

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