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11 अक्तूबर, 2012

11-10-2012

भानुमती के पिटारे की तरह विचार 

यहाँ मेरे आसपास आयोजनों का खालीपन है। जमावड़ा  है तो सिर्फ मुसीबतों का,चिंताओं का। कहीं जाना नहीं है। जहां जाना है वे शहर इतने दूर हैं कि घर वालों की स्वीकृति के लिए आवेदन लगाने में शर्म आती है।कुछ आयोजन दिल्ली में होते हैं।मगर हम चित्तौड़ में पड़े हैं। कभी पटना,बनारस और लखनऊ सरीखे शहर बहुत याद आते हैं।आख़िरी वक्तव्य यही है कि  हम जा नहीं पाते।यहाँ पास के सलुम्बर में विमला भंडारी जी ने बाल साहित्य का सम्मलेन किया है,कहीं प्रतिरोध का सिनेमा,लखनऊ से ललचाता है।चुपचाप गुज़रते इस दौर में बस आयोजन होते चले जा रहे हैं और हम घर में पड़े पड़े बड़े हो रहे हैं।

इधर कुछ बड़े नाम ने बहुत आकर्षित किया है।मैं उन्हें पढ़ना भी चाहता हूँ। मगर उनकी किताबों तक पहूँचने में वक़्त लगेगा। ब्लॉग्गिंग के नाम पर वक़्त कविता जैसी कुछ पंक्तियाँ सजाने में गुज़र रहा है। यदा कदा कुछ पसंद के ब्लॉग पढ़ लेते हैं। 

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