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01 नवंबर, 2012

01-11-2012

उठने के ठीक बाद
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पांच सौ साल पहले हुयी एक कवयित्री के नाम पर हुए एक बड़े समारोह के फीकेपन से दिल आहत है।आम जनता की बेरुखी दिल दुखाती हैं।आयोजन के नाम पर धाम-धड़िके की मनुहारें खलती हैं। एक ईमान के साथ भागते-दौड़ते आयोजन। प्रचार-प्रसार के पुरातन तरीके। महोत्सव को उत्सव तक खींच लाती पांच दिन की यात्रा। अखबारों और टीवी में मिनटों में निबटता आयोजन। लाखों का खर्चा ,नतीजे निराशा की तरफ मूंह फेरते  हुए। चुनिन्दा नामों का दोहराव और हल्का फुल्का मंच आँखों में घूमता है। समारोह के आकर्षण में कवयित्री की प्रगतिशीलता गायब रही।कलाविदों का दोहराव बोरियत पैदा करने में मशगूल रहा।पहले दिन तीन सौ,दूजे दिन सवेरे पचत्तर और शाम  ढाई हज़ार दर्शक/रसिकजन की हाज़री रही। नेताओं के नाम पर सन्नाटा। दानदाताओं और उनके रिश्तेदारों के जलवे। कुछ नए स्वयं सेवकों का सूचि में शामिल होना।पुराने स्वयं सेवकों का अचानक बीमार पड़ जाना। फीकेपन के कारणों में आयोजन स्थल के बदलाव पर ठीकरे फोड़ने की कुछ कोशिशें। मंच सञ्चालन कर्ताओं में कुछ आवाजें गायब। कुछ तेवरबाज लोगों के ढीले कोट। कुछ नए सफेदपोश का जमात में शिरकत करना।बहती गंगा में हाथ धोते साथी। आखिर समय तक फेरबदल में टूटते हुए नियम-कायदे।
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चित्तौड़ से मंगोदड़ा  घाटे की तरफ बीस किलो मीटर पर एक दोपहर से शाम तक की यादें।बड़ी का खेड़ा में देसी तरीके बनी दाल-बाटी और छाछ के स्वाद।गाँव की सादगी में शहर के वाशिंदों का अल्प ठहराव। एनिकट से रिस कर आने वाले पानी से बहे नाले के किनारे बने शिवजी।ढलान,पठारी भूमि,पत्थर,पहाड़,बारिश के ठीक बाद कम हरियाले पेड़।आकाशवाणी के अधिकारी योगेश कानवा,पुरबिया जी और बाबू कैलाश जैन के साथ बहुत सी बातें।दोस्त भगवती लाल सालवी के पांचवी तक के स्कूल में एक शाम।चार दिवारी के एक कोने में हेंडपम्प। आधा मैदान खेल के नाम।बाकी में कुछ बड़े बड़े पेड़ों के बीच एक सात साल पुराना पीपल।गाँव में सांप,गोयरे की आवाजाही।खेती कम मजूरी ज्यादा करते लोग।दूर तक फेक्टरियों में जाते मजदूरों का शाम को टेम्पो में घर लौटना।यही कुछ था वहाँ।
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